प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ ] प्रबन्धचिन्तामणि . . [ पंचम प्रकाश
किसी पुरुषके साथ इस प्रकार बात-चीत करने लगा कि- ' हमारे स्वामीको अच्छी सलाह देनेमें कोई वृद्ध' भी नहीं
दिखाई देता; जिससे यह अश्वपति महीमहेन्द्र ( राजा ) एक मामूली बनियेके कहनेसे-जिसका न तो कोई कुल-
शील ही मालूम है और न यही मालूम है कि यह कोई अच्छा आदमी है या बुरा; और फिर जो नामसे भी
और कर्मसे भी रंक बना हुआ है-सूर्यपुत्र शिलादित्यके प्रति चल पड़े हैं 1' उसकी इस यथार्थ पथ्य बातको
सुन कर, चित्तमें कुछ विचार करके, राजाने उस दिन आगे प्रयाण करनेमें विलेब किया । तब, उस सशंक
रंकने, इस बातको निपुणभावसे जान कर, उस छत्रधरको काञ्चन-दान दे कर सन्तुष्ट किया । तब फिर दूसरे
दिन [ वही छत्रधर बोला ] चाहे विचार करके या बिना बिचारे ही यह राजा प्रयाण करके चल पड़ा हो; पर
अब ' सिंहके उठाये हुए पैरकी नाई ' इस कहावतके अनुसार आगे चलनेपर ही इसकी शोभा है । क्यों कि-
२३९. खेल ही में जिसने हाथियोंका दलन किया है उस सिंहको, लोग चाहे मृगेन्द्र कहें चाहे मृगारि,
ये दोनों बातें सिंहके लिये तो लज्जाजनक ही हैं ।
और फिर इस पराक्रमशालीके सामने ठहर भी कौन सकेगा ? ' उसकी ऐसी बातोंसे उत्साहित हो कर,
भेरीके निनादसे पृथ्वी और आकाशके अंतरालको बधिर करते हुए उस म्लेच्छराजाने आगे प्रयाण किया । इधर
उस अवसरपर वलभी स्थित चन्द्रप्रभका बिंब, अम्बा और क्षेत्रपालके साथ, अधिष्ठायक देवताके बलसे आकाश
मार्ग द्वारा शिवपत्तन ( सोमनाथ ) की भूमिको प्राप्त हुआ । रथपर अधिरूढ श्री वर्धमानकी अनुपम प्रतिमा ने,
अदृश्य भावसे, अधिष्ठातृ देवताके बलसे रास्तेमें चलते हुए आश्विनी ( आश्विन मासकी ) पूर्णिमाके दिन
श्रीमालपुर को अलंकृत किया । अन्य अतिशयवाली देवमूर्तियोंने भी यथोचित भूभागको अलंकृत किया ।
उस नगरकी अधिष्ठातृ देवताने श्रीवर्धमान सूरिके साथ, उत्पातज्ञापनके समय [ इस तरहकी बातें कीं ]-
२४०. ' हे देवीके सदृश सुंदरि, तुम किस कारणसे रो रही हो सो बताओ '; ' हे भगवन्, मैं
वलभीपुरका भंग देख रही हूँ। इसका प्रमाण यह है कि आपके साधु लोग भिक्षामें जो
दूध पायेंगे वह तब रक्त हो जायगा । [ फिर यहाँसे जा कर ] मुनियोंको उसी स्थानपर रहना
चाहिये जहाँ पानी भी दूध हो जाय ' ।
इसके बाद, जब वह उत्पात हुआ और नगरीके पास म्लेच्छ सेना आ गई, तो देशभंगके पापपंकमें फसे
हुए रंकने धन दे कर, पंच शब्दवाले वाद्योंके बजानेवालोंको अच्छी तरह फोड लिया। जब शिलादित्य घोड़े-
पर चढ़ने लगा तो उन्होंने ऐसा प्रतिशब्द किया, जिससे वह घोड़ा, गरुड़ की भाँति आकाशमें उड़ गया । यह
देख कर राजा शिलादित्य किंकर्तव्यमूढ़ हो रहा और उन म्लेच्छोंने उसे मार डाला । फिर तो म्लेच्छोंने खेल
ही में वलभी शहरको तहस-नहस कर दिया ।
२४१. विक्रमादित्यके समयसे ३७५ वर्ष बाद, वलभी नगरीका यह भंग हुआ ।
इस प्रकार शिलादित्य राजाकी उत्पत्ति, रंककी उत्पत्ति और उसके द्वारा किये गये
वलभी-भंगका यह प्रबन्ध समाप्त हुआ ।
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श्रीपुंजराजकी उत्पत्ति ।
२०४) श्रीरत्नमाल नगरमें रत्नशेखर नामक राजा हुआ। वह किसी समय, दिग्विजयसंबंधी यात्रासे
वापस लौट कर अपने नगरमें आया । प्रवेशके महोत्सवके समयमें, बाजारकी शोभाकी सजावट देखता हुआ जब
जा रहा था, तब एक हाटमें काठके पान ( कठौत ) सहित कुदालको रखे हुए देखा । महलमें प्रवेश करनेके बाद
जब महाजन लोग उपहार ले कर आये तो उनसे पूछा कि 'आप सब लोग सुखी तो हैं !' तो उन्होंने कहा-