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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

१२८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश
२२८. धर्मठगका प्रयोग करके जो राजालोक ऋद्धि प्राप्त करते हैं, वह मांके शरीरको बेंच कर
पैसा कमानेके समान होती है।
इस नीतिशास्त्रके उपदेशद्वारा, उन वृक (भेडियों) जैसोंके मुहस उस छाग (बकरे) को छुड़ा कर और पाथेयादिसे
संस्कृत कर, तीर्थयात्रा करनेके लिये रवाना किया। कुछ सालके बाद, वह जब वापस लौट कर आया तो मंत्रीने
फिर उचित सत्कारसे उसका आदर किया। इससे वह अपने स्थान पर पहुच कर [अपने सुलतानके सामने] तीर्थ
यात्राका वखान करनेके बदले श्रीवस्तुपालके गुणोंका ही बखान करने लगा। इसके बाद वह सुलतान प्रति-
वर्ष मंत्रीके पास यमळकपत्र (संधिपत्र) भेज कर अनुरोध करता रहा कि-'हमारे देशके आप ही अध्यक्ष हैं,
और हम तो आपके सेलभृत् (सामंत) हैं। सो हमें किसी करणीय कार्यका आदेश दे करके सदा अनुगृहीत किया
करें'। मंत्रीने शत्रुञ्जय तीर्थके भूमिगृहमें रखनेके लिये सुलतानकी आज्ञासे, उसके देशमेंकी मम्माणी नामक
खानमेंसे, सेंकड़ों प्रयत्न करके युगादि जिनकी एक मूर्ति बनवा कर मँगवाई। सुलतानने अपनेको धन्य मानते हुए
वह कार्य करने दिया। वह मूर्ति जब पर्वत पर चढ़ाई जा रही थी तो मूलनायकके अमर्षसे पर्वत पर बिजली
गिरी। इसके बाद मंत्रीश्वरको फिर जीवनान्त तक शत्रुञ्जय देवके दर्शन नहीं हुए।
अनुपमाकी दानशीलता।
१९२) किसी पर्वके अवसर पर, अनुपमा देवी मुनियोंको यथेच्छ निरुपम दान दे रही थी। तब किसी
राजकार्यकी उत्सुकताके कारण स्वयं वीरधवलदेव उस समय वहां आ पहुंचा तो उसने देखा कि श्वेताम्बर
साधु-यतियोंकी भीडसे मकानका दरवाजा मानो दटा हुआ है। तब विस्मयसे मनमें चकित हो कर वह मंत्रीसे
बोला-'हे मंत्री, अभिमत देवताकी भाँति, सदा ही इन साधुओंका इस तरह सत्कार क्यों नहीं किया करते ? अगर
तुमसे न हो सकता हो तो आधा हिस्सा मेरा रहे। मेरा ही सदा दिया जाय - ऐसा तो इस कारणसे नहीं
कहता कि वैसा करने पर तो फिर तुमको यह वृथा ही परिश्रम करने जैसा लगे।' उसके मुखचन्द्रसे इस प्रकार
वाणीरूप किरणके निकलने पर मंत्रीके मनका संताप दूर हुआ और वह बोला-'स्वामीका आधा हिस्सा क्या ?
सब कुछ तो आप ही का है।' यह कह कर उसने वस्त्र निछावर किया।
१९३) एक दूसरी बार, यतिदानके अवसर पर, अनेक मुनियोंकी भीड़के कारण नमन करती हुई
श्रीमती अनुपमाकी पीठ पर घीने भरा हुआ एक पात्र गिर पड़ा। यह देख कर मंत्री तेजपाल बड़ा कुपित
हुआ। उसे कुपित देख कर अनुपमाने यह कह कर सान्त्वना दी कि-'आप जैसे स्वामीके प्रसादसे ही तो
मुनिजन द्वारा गिराये गये पात्रके घीसे मेरा यह अभ्यङ्ग (घृतस्नान) हुआ!' इस प्रकार उसकी पूर्णदानकी
रीतिसे चमत्कृत हो कर, मंत्रीने पञ्चाङ्ग प्रसाद पूर्वक उसकी इस उचित उक्तिसे प्रशंसा की-
२२९. प्रिय वाणीपूर्वक दान, गर्वरहित ज्ञान, क्षमायुक्त शूरता और त्यागसहित धन, ये चार भद्र
(भले) कार्य दुर्लभ हैं।
इस प्रकारकी अनेक दानवार्ताओंसे प्रसिद्धी पाने वाली उस देवीकी जैनाचार्योंने इस तरह स्तुति की-
२३०. लक्ष्मी चञ्चला है, शिवा चण्डी (कोपना) है, शची सौतदोषसे दूषित है, गङ्गा निम्नगामिनी
है और सरस्वती वाचाल है। इस लिये अनुपमा तो सब तरहसे अनुपमा ही है।
*
वीरधवलकी रणशूरता।
१९४) एक दूसरी बार, लवणप्रसाद और वीरधवल पञ्चग्रामके [स्वामीके] साथ सग्राम करने पर जुड़े।
तब श्री वीरधवलकी पत्नी जयतल्लदेवी संधिविधानकी इच्छास अपने पिता प्रतीहार वंशीय श्री