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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

११२ ] प्रबन्धचिन्तामणौ [ चतुर्थ प्रकाश
सेवड़ ( श्वेताम्बर साधु ) आ रहा है ।
इस प्रकारका अत्यधिक निन्दास्पद कथन सुन कर, अन्तःकुटिल पर बाहरसे सरल दिखाई देनेवाले
तिरस्कार पूर्ण वचनसे प्रभुने कहा कि- 'अरे पंडित ! तुमने क्या यह भी नहीं पढ़ा कि विशेषणका प्रयोग
पहिले किया जाना चाहिए । अब से 'सेवड-हेमड' ऐसा कहना ( हेमड-सेवड ) नहीं । सेवकों ने [ यह
सुन कर ] उसे भालेकी नोंकसे घोड़ा कर छोड़ दिया । राजा कुमार पालके राज्यमें शस्रवध नहीं किया
जाता था, इस लिये उसकी वृत्तिका छेद कर दिया गया । इसके बाद, कण-कणकी भीख माँग कर अपना
प्राण धारण करता हुआ वह प्रभुकी पौषधशालाके सामने आ कर बैठा । उस समय वहाँ पर अनादि भूपति
नामक मठके तपस्वियों द्वारा अधीयमान योगशास्त्रका श्रवण करके, उसने फिर सच्चे हृदयसे यह
काव्य कहा कि-
२०९. जिन अकारण दारुण मनुष्योंके मुँहसे आतंकका कारण ऐसा गाली-रूपी गरल ( विष )
निकला है उन जटा धारण करने वाले फटाधरों (सर्पों) के मंडलका, यह योगशास्त्र का
वचनामृत अब उद्धार कर रहा है ।
ऐसे अमृतके समान मीठे उसके वचनसे, प्रभुका वह उपताप शान्त हुआ और उसकी वृत्ति फिर दुगुनी
कर उसे प्रसादित किया ।
इस प्रकार यह वामराशि-प्रबंध समाप्त हुआ ।
*
सोरठके दो चारणोंकी कविताविषयक स्पर्द्धा ।
१६३) फिर कभी, एक बार, सुराष्ट्र मंडलके रहने वाले दो चारण, परस्पर दुहा-विद्यामें (दोहा
छन्दकी रचना करनेमें ) स्पर्द्धा करते हुए यह प्रतिज्ञा करके अणहिल्लपुरमें पहुँचे कि- 'हेमचंद्राचार्य
जिसके दोहाकी सराहना करेंगे, उसे दूसरा हर्जाना देगा ।' फिर उनमेंसे एकने, प्रभुकी सभामें आ कर
यह दोहा कहा-
२०२. हे हेम सूरि ! मैं तुम्हारे मुँह पर वारी जाऊँ । लक्ष्मी और वाणी (सरस्वती) का जो सापत्न्य
(बैर) भाव था वह, इसने नष्ट कर दिया । क्यों कि हेमचंद्रसूरिकी सभामें तो जो पण्डित
हैं वे ही लक्ष्मीवान् हैं ।
ऐसा कह कर, उसके चुप हो जाने पर, फिर श्रीकुमार विहारमें आरतीके अवसर पर राजा जब
प्रणाम कर रहा था और प्रभुने उसकी पीठ पर हाथ रखा हुआ था, उसी समय वहाँ प्रवेश करके दूसरे
चारणने यह कहा-
२०३. हे हेम सूरि ! मैं तुम्हारे इस हाथ पर वारी जाऊँ-जिसमें अद्भुत ऋद्धि रही हुई है । नीचे
नमे हुए जिस मुख ऊपर यह पड़ता है उसके ऊपर सिद्धि आ बैठती है ।
इस प्रकारके अनुद्विष्ट (मौलिक) भाववाले उसके वचनसे मनमें चमत्कृत हो कर राजा इसी दोहेको
बार बार बुलाने लगा । तीन बार बोलने बाद उसने कहा कि-क्या एक एक बार बोलने पर एक एक लाख
दोगे ?' - इस पर राजाने उसे ३ लाख दिलाया !
इस प्रकार यह दो चारणोंका प्रबंध समाप्त हुआ ।
*