प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश
१९५. कंचल और दंड वाला यह हेम तुम्हारी रक्षा करे ।
इस प्रकार कह कर वह ठहर गया । राजाने उसे क्रोधकी दृष्टिसे देखा । तब फिर-
जो षड्दर्शन रूप पशुओंको जैन-गोचर ( चरागाह ) में चरा रहे हैं ।
यह उत्तरार्द्ध पढ़ा जिसे सुन कर सारी सभा प्रसन्न हुई । फिर कविने रामचन्द्रादि [ कवियों ] को
समस्यायें पूर्ण करनेको दीं । ' व्यापिद्धा नयने०' इस चरणवाली एक समस्याकी पूर्ति महामात्य कपर्दीने
इस प्रकार की
१९६. 'इसकी ये सरल (बड़ी बड़ी ) आंखें दोनों हथेलियोंसे ढकीं नहीं जा सकतीं, और अपने
मुखरूपी चन्द्रमाकी चांदनीके प्रकाशसे यह सब कहीं दिखाई दिया करती है- इस लिये आँख
मिचौनीके खेलमें अपनी चारों ओर रहीं हुई सखियोंके बीचमें बैठी हुई यह बाला [ खेलनेसे ]
रोक दी गई है और इस लिये वह अपने मुख और आँखोंको रो रही है।'
[ इस समस्यापूर्तिकी प्रतिभासे प्रसन्न हो कर ] उस कविने पचास हजारकी कीमतका अपने गलेका हार
निकाल कर कपर्दीके कण्ठमें यह कहते हुए डाल दिया कि ' यह तो श्रीभारतीका पद ( स्थान ) है।'
उसकी सहृदयतासे चमत्कृत हो कर राजा उसे अपने पास रखने लगा, तो वह यह कह कर, राजा द्वारा
सत्कृत हो कर, यथास्थान चला गया कि-
१९७. कर्णकी कथा तो अब शेष मात्र रह गई है। काशी नगरी मनुष्योंकी कमीके कारण क्षीणप्राय
हो गई है । पूर्व ( या उत्तर ) दिशामें हम्मीर ( म्लेच्छ ) के घोड़े सहर्ष हिनहिना रहे हैं।
इससे यह मेरा हृदय तो अब, सरस्वतीके आलिङ्गनमें प्रवृत्त क्षारसमुद्रके साथ स्नेहवाले
प्रभासक्षेत्रके लिये उत्कण्ठित हो रहा है।
*
हेमचन्द्रसूरिका समस्या पूरण करना ।
१५०) किसी समय कुमारविहार देवमन्दिरमें राजा द्वारा आमंत्रित हो कर प्रभु श्रीहेमचंद्र, कपर्दी
मंत्री द्वारा हाथका सहारा पा कर, जब सोपान पर चढ़ रहे थे [ वहा पर नृत्योद्यत ] नर्तकीके कञ्चुककी
कसनीको तनती हुई देख कर कपर्दीने यह कहा-
१९८. हे सखि तेरा यह कञ्चुक सौभाग्यशाली है इस लिये इसका यह तनना युक्त ही है ।
यह कह कर उसे जब आगे बोलनेमें विलंब करते देखा तो प्रभुने उत्तरार्ध इस प्रकार कह दिया-
जिसके गुणका ग्रहण पीठपीछे तरुणीजन करता है।
*
आचार्य और मंत्रीके बीचमें 'हरडइ'का वाग्विलास ।
१५१) एक बार, सबेरे कपर्दी मन्त्रीने श्री सूरिको प्रणाम करनेके बाद [ उसके हाथमें कोई चीज
देख कर ] उन्होंने पूछा-' यह क्या चीज है ?' उसने प्राकृत (देशी) भाषामें कहा-'हरडइ'-अर्थात्
'हर्रे' । प्रभुने कहा-'क्या अब भी ?' । तब वह अपनी अनाहत प्रतिभा (प्रखर बुद्धि) के कारण उनके व-
चनच्छद्म (व्यंग्य) को समझ कर बोला-'अब तो नहीं'। क्यों कि अन्तिम होने पर भी वह आदिम हो गया
और एक मात्रा अधिक भी हो गया। हर्षाश्रु पूर्ण आँखोंसे प्रभुने रामचंद्र आदिके सामने उसकी चतुराईकी
प्रशंसा की । उन्होंने (रामचंद्रादिने) तत्त्व न समझ कर पूछा कि 'बात क्या है?' प्रभुने कहा कि 'हरडइ'
इसमें शब्दच्छलसे यह अर्थ लक्ष्य करके निकाला गया कि 'ह रडइ' अर्थात् हकार रोता (गुजराती रडता)