प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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मनुष्योंको साथ ले कर, अकस्मात् उस देवीके मंदिरमें प्रादुर्भूत हुआ । उसने देवीकी रत्न, सुवर्ण और कर्पूरसे
पूजा अर्चा की और उस राजाकी रानियोंको उसी प्रकारके उत्तम पानके बीड़े दिये । फिर श्रीसिद्धराजका
नामांकित वह सिद्धदेव पूजाके बहाने वही रख कर, उसी बर्बरके कंधेपर चढ़कर, उड़ता हुआसा जैसे आया
था वैसे ही चला गया । रातके अन्तमें रानियोंने उस तिरोवी राजाको यह वृत्तान्त कह सुनाया तो, भयभ्रान्त
हो कर उसने, उस उपहारको, अपने प्रधान पुरुषोंके द्वारा सिद्धराजके पास पहुँचा दिया । इधर उस सेवकने
अपने मालके क्रय-विक्रयका संकोच करके शीघ्रगामी पुरुषके साथ यह खबर भिजवा दी कि- 'जब तक मैं न
आऊँ तब तक इन प्रधान पुरुषोंको दर्शन न दीजियेगा ।' फिर स्वयं जल्दी जल्दी चल कर कुछ ही दिनोंमें
वहाँ पहुँच गया । उसके अपने कियेका पूरा वर्णन करने पर, राजाने उन प्रधानोंका यथोचित स्वागतादि किया ।
इस प्रकार यह कोल्हापुर प्रबंध समाप्त हुआ ।
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कौतुकी सीलणकी वाक्चातुरी ।
१२०) श्रीसिद्धराज, मालवमण्डलसे यशोवर्मा राजाको जब बाँध लाया, तब उसके निमित्त किये
जाने वाले उत्सव पर सीलण नामक कौतुकीने कहा कि- 'अहो बेड़ा (नाव) में समुद्र डूब गया ।' तब
उसके पीछे स्थित किसी गायन (गान करनेवाले) ने 'तुम अपशब्द कह रहे हो'-ऐसा कह कर उसकी
तर्जना की । तब उसने अर्थापत्तिसे इस प्रकार विरोधाऽलङ्कारका परिहार करके बताया कि-'बेटाके समान इस
गूर्जर भूमिमें समुद्र जैसा यह मालव-नरेश डूब गया।' [इस पर उसने] राजासे सोनेकी जीभ प्राप्त की।
इस प्रकार यह कौतुकी सीलणका प्रबंध समाप्त हुआ ।
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काशीपति जयचन्द्रकी सभामें सिद्धराजके दूतकी वाक्पटुता
१२१) किसी समय, सिद्धराजके एक वाचाल सन्धिविग्रहिक (दूत) से काशीके राजा जयचंदने
अणहिल्लपुरके प्रासाद, प्रपा (वावडी) और निपान (कूप) आदिका स्वरूप पूछते समय [उसकी
विशेष शोभा सुन कर, ईर्ष्यावश राजाने] यह दोष बताया कि-'सहस्रलिंग सरोवरका जल शिव-निर्माल्य
होनेके कारण अस्पृश्य है । उसका सेवन करने वाले दोनों लोकसे विरुद्ध व्यवहार करते हैं । अतः वहाँके
लोग, उदित प्रभाव वाले कैसे हों ? सिद्धराजने सहस्रलिंग सरोवर बना कर यह अनुचित कार्य
किया है।' राजाकी इस बातसे मन-ही-मन कुपित हो कर उसने राजासे पूछा कि-[आपकी] 'इस वाराणसी में
कहाँका जल पिया जाता है ?' राजाके 'गंगाजल' ऐसा कहने पर उसने कहा-'क्या गंगाजल शिव निर्माल्य
नहीं है तो और क्या है ? शिवका सिर ही तो गंगाकी निवास-भूमि है ।'
इस प्रकार जयचंद्र राजाके साथ गूर्जरके प्रधानकी उक्तिप्रत्युक्तिका प्रबंध समाप्त हुआ ।
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मयणल्लादेवीके पिताकी मृत्युवार्त्ता ।
१२२) किसी समय, कर्णाट देशसे आये हुए सन्धिविग्रहिकसे मयणल्लादेवीने अपने पिता
जयकेशीका कुशल समाचार पूछा तो उसने अश्रुपूर्ण आँखोंसे कहा कि-'स्वामिनि, प्रख्यातनामा महाराज श्री
जयकेशी भोजनके समय पिंजरेमे तोतेको युद्ध लड़ा रहे थे । उसके 'मार्जार' (बिल्ली) बैठी है, ऐसा कहने पर,
राजाने चारो ओर देख कर-किन्तु अपने भोजनके पात्रके [चौकीके] नीचे छिपे हुए मार्जारको न देख कर-