प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ ] · प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश
दर्शनके लिये उत्कंठित हो कर उसके निवासस्थानमें गये और राजाको प्रणामादि करके उसके अनुपम ऐसे
पलंग पर ही बैठ गये । आसन देनेके लिये नियुक्त नौकरोंने उनको अलग आसन पर बैठनेको कहा तो वे लोग
अपने हाथोंसे उस पलंगकी कोमल शय्याका स्पर्श करते हुए [ भोले भायसँ ] 'हम लोग यहाँ बड़े आरामसे
बैठे हैं'—ऐसा कहते हुए वहीं बैठ रहे । [यह देख कर] राजाका मुख मुस्कुराहटसे कमलकी भाँति खिल उठा ।
इस प्रकार उञ्झावासी ग्रामीणोंका यह प्रबंध समाप्त हुआ !
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झाला सामंत माँगूकी शूरताका वर्णन ।
११७) किसी समय, झाला जाति का माहू नामक क्षत्रिय श्री सिद्धराज की सेवाके लिये सभामें
आया करता था । वह रोज़ ही दो परांची (लोहेकी भारी कुसी) जमीनमें गाड़ कर बैठता और फिर उन दोनोंको
उखाड़ कर उठता । उसके भोजनमें घीसे भरा एक कुतुप (कुड़वा—घी तेल भरनेका घड़ेके जैसा चमड़ेका
भाजन) खर्च होता था । घी लगी हुई उसकी दाढ़ीके धोने पर भी उसमें सोलहवाँ हिस्सा घी बच जाता था।
किसी समय उसके शरीरमें रोग होने पर, पथ्यके लिये यवागू (जौकी पतली माँड) खानेको वैद्यने कहा तो,
वह ५ माणक (करीब ४ सेर कच्चे नाप जितनी) खा गया । इस पर वैद्यने डाँट कर कहा कि आधा भोजन
कर लेने पर बीचमें अमृतोदक क्यों नहीं पिया ?' क्यों कि कहा है कि—
१६८. जब तक सूर्योदय न हो जाय तब तक एक हजार घड़ा भी पानी पिया जा सकता है, पर
जब सूर्योदय हो जाता है तो फिर एक बूँद भी एक घड़ेके बराबर हो जाता है।
रातकी पिछली चार घड़ीमें, सूर्योदय न होने तक, जो जल पिया जाता है—जो जल प्रयोग किया
जाता है—उसे बज्रोदक कहते हैं (वह अमृतोदक भी कहाता है)। सूर्योदय हो जाने पर बिना अन्न खाये, जो
पानी पिया जाता है, वह विष है। इस लिये एक बूँद भी वह पानी सौ घड़ोंके बराबर हो जाता है। आधा
भोजन करने पर, बीचमें जो जल पिया जाता है वह अमृत कहलाता है, और भोजनान्तमें तत्काल पिया
जाता हुआ जल छत्र या छत्रोदक कहलाता है। उस माँगूने, यह सुन कर कहा कि—'यदि ऐसा है, तो पहिले
जो अन्न खाया है उसे आधा आहार कल्पना कर लिया जाय, और इस समय अब पानी पी कर फिर उतना ही
आहार और कर लूँ।' ऐसा कह कर वह फिर खानेकी तैयारी करने लगा, लेकिन वैद्यने उसे वैसा करनेसे
रोक दिया ।
' किसी समय राजाने उसके निःशस्त्र रहनेका कारण पूछा । उसने कहा कि—'मेरा हथियार तो समयोचित
होता है'। फिर एक बार उसके स्नान करते समय, किसी महावत द्वारा चलाये हुए हाथीको अपने ऊपर
आता देख, नज़दीकमें रहे हुए कुत्तेको पकड़ कर उसकी सूंड पर फेंक मारा । मर्मस्थान पर चोट लगनेके कारण
निपीडित ऐसे उस हाथी को खींचा, तो उसके अतुल बलसे वह हाथी भीतर-ही-भीतर नसोंमेंसे टूट गया और उस
महावतके नीचे उतरने पर, वह जमीन पर गिरते ही प्राणोंसे मुक्त हो गया । गूर्जर देश पर आयी हुई म्लेच्छोंकी
सेनाको देख कर राजाके पलायन कर जाने पर, वह अपनी इच्छासे उस सेनाका उच्छेद करता हुआ, युद्धमें
जिस स्थान पर मारा गया, उस जगहकी, पत्तन में अब भी 'माहूरयण्डिल' के नामसे प्रसिद्धि चल आ रही है ।
इस प्रकार यह माँगू प्रबंध समाप्त हुआ ।