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प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रबन्धचिन्तामणि विषयानुक्रम
(७) मंत्रीका मुसलमान सुलतानके साथ मैत्रीका सम्बन्ध बान्धना .... १२७
(८) अनुपमाकी दानशीलता .... .... .... .... १२८
(९) वीरधवलकी रणशूरता .... .... .... .... ,,
(१०) वीरधवलकी मृत्यु .... .... .... .... १२९
(११) अनुपमाकी मृत्यु .... .... .... .... ,,
(१२) वस्तुपालकी मृत्यु .... .... .... .... ,,
— पंचम प्रकाश —
११ प्रकीर्णक प्रबन्ध .... .... .... .... १३१-१५२
(१) विक्रमादित्यकी पात्र परीक्षा .... .... .... १३१
(२) मरे हुए नन्दका पुनर्जीवन .... .... .... ,,
(३) राजा शीलादित्य और मल्लवादी सूरिका प्रबन्ध .... .... १३२
(४) बौद्ध और जैनोंमें वाद-विवाद .... .... .... ,,
(५) वलभी नगरीके विनाशकी कथा .... .... .... १३३
(६) श्री पुंजराजकी उत्पत्ति .... .... .... १३४
(७) श्रीमाताकी उत्पत्तिका वर्णन .... .... .... १३५
(८) चोड देशके गोवर्धन राजाकी न्यायप्रियताका उदाहरण .... १३६
(९) पुण्यसार राजाका वृत्तान्त .... .... .... १३७
(१०) कर्मसार राजाका प्रबन्ध .... .... .... ,,
(११) राजा लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका प्रबन्ध .... .... १३८
(१२) काशीके जयचन्द्र राजाका प्रबन्ध .... .... १३९
(१३) जगदेव क्षत्रियका प्रबन्ध .... .... .... १४१
(१४) पृथ्वीराजके तुंग सुभटका प्रबन्ध .... .... १४३
(१५) पृथ्वीराजका म्लेच्छोंके हाथ मारा जाना .... .... १४४
(१६) कोंकण देशकी उत्पत्ति कैसे हुई .... .... .... १४५
(१७) ज्योतिषी वराहमिहिरका प्रबन्ध .... .... .... ,,
(१८) सिद्धयोगी नागार्जुनका वृत्तान्त .... .... .... १४७
(१९) स्तंभनक पार्श्वनाथका प्रादुर्भाव .... .... .... १४८
(२०) कवि भर्तृहरिकी उत्पत्तिका वर्णन .... .... .... ,,
(२१) वाग्भट वैद्यका प्रबन्ध .... .... .... १४९
(२२) गिरनार तीर्थके निमित्त श्वेताम्बर-दिगम्बरमें लड़ाई .... .... १५०
(२३) सोमेश्वरका अपने भक्तोंकी परीक्षा करना .... .... १५१
(२४) पूर्वजन्मका किया भोगना .... .... .... ,,
(२५) जिन पूजाका माहात्म्य .... .... .... १५२
— ग्रन्थकारकी प्रशस्ति .... .... .... १५३
परिशिष्ट — कुमारपालका अहिंसाके साथ पाणिग्रहणका रूपकात्मक प्रबन्ध १५३-१५६