प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 181 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण १०४-१०८ ] सिद्धराजका शत्रुंजयकी यात्रा करना [ ७७
[ १०१ ] हे गरवा गिरनार ! तुम पर वारि जाती हूँ । [ खंगारके लिये ] लंबा बुलावा आया है ।
इसके जैसा भारक्षम ( समर्थ ) सज्जन फिर दूसरी बार तुझे नहीं मिलेगा ।
[ १०२ ] मुझको इतने-ही-से संतोप होगा, जो प्रभु ( स्वामी ) के पगोंमें [ मेरा भी शरीर अग्निद्वारा ]
प्रदीप्त हो । न मुझे रानीपनकी चाहना है, न रोष है । ये दोनों खंगार के साथ चले गये ।
[ १०३ ] हे मन ! अब तंबोल मत माँगो, खुले मुँह मत झांको । देउलवाडे के संग्राममें खंगार के
साथ वह सब चला गया है ।
[ १०४ ] हे जेसल ! मेरी बाँह मत मोडो और वारंवार विरूप भाव न बताओ । नवघनके बिना
नदीमें नया प्रवाह नहीं आता ।
[ १०५ ] हे वढवाण ! मैं तुझसे क्या लडूं - भूल जाना चाहती हूँ लेकिन भूल नहीं सकती । हे
भोगावा ( वढवाणके पासकी नदी ) तँने सोनाके समान प्राणोंका भोग लिया ।
इस प्रकारके बहुतसे वाक्ये [ कहे जाते ] हैं । ये यथाप्रसंग जानलेने योग्य हैं ।
१०७) इसके बाद, महं० जाम्ब के वंशज दण्डाधिपति सज्जन की योग्यता देखकर उसे सुराष्ट्र देश
का प्रबन्धक ( गवर्नर ) नियुक्त किया । उसने स्वामीको बिना सूचन किये ही, तीन वर्षके वसूल किये हुए
[ राजकीय ] द्रव्यसे श्रीउज्जयन्त ( गिरनार ) पर्वत पर स्थित नेमिनाथके काठके बने हुए जीर्ण मन्दिरको
उखाड़ कर उसके स्थानमें नया पत्थरका मन्दिर बनवाया । चौथे वर्ष चार सामंतोंको भेज कर राजाने सज्जन
दण्डाधिपतिको पत्तन में बुलवाया । उससे [ पिछले ] तीन वर्षका वसूल किया हुआ द्रव्य माँगने पर, साथमें
लाये हुए उसी देशके व्यवहारियोंसे उतना ही धन ले कर देता हुआ वह बोला - 'महाराज ! श्रीउज्जयन्त के
मंदिरके जीर्णोद्धारका पुण्य अथवा यह धन इन दोनोंमेंसे चाहे सो एक ले लें ।' उसके ऐसा बताने पर उसकी
अतुलनीय बुद्धिसे चित्तमें चमत्कृत हो कर सिद्धराज ने तीर्थोद्धारका पुण्य लेना ही स्वीकार किया । वह
सज्जन फिर उसी देशका अधिकार पा कर, उसने शत्रुंजय और उज्जयन्त इन दोनों तीर्थोंमें उनके बीचके
बारह योजन विस्तृत अन्तरके जितना ही लंबा दुकूलका बना हुआ महाध्वज चढ़ाया ।
इस प्रकार यह रैवतकोद्धार प्रबन्ध समाप्त हुआ ।
*
सिद्धराजका शत्रुंजयकी यात्रा करना ।
.१०८) इसके बाद, एक बार फिर सोमेश्वरकी यात्रा कर वापस लौटते समय श्री सिद्धराजने,
'रैवतकगिरिकी उपत्यकामें डेरा डाल कर, अपना कीर्तन ( मन्दिरादि धर्मस्थान ) देखना चाहा । उसी समय
मत्सरपरायण ब्राह्मणोंने यह कह कर पिशुनवाक्योंसे उसे रोका कि 'यह पर्वत सजलाधार लिंगके आकारका
है, इसलिये इसे पैरोंसे स्पर्श करना उचित नहीं है ।' राजाने वहाँ पर पूजा भिजवा कर प्रस्थान किया और
शत्रुंजय महातीर्थके पास आकर पड़ार डाला । वहाँ पर भी उन्हीं निर्दय चुगलखोर ब्राह्मणोंने हाथमें कृपाण ले
कर तीर्थ पर जानेका मार्ग रोका । उनके ऐसा करने पर श्री सिद्धराज ने सबेरा होनेके पहले ही, कापड़ीका
वेष बना कर, और जिसके दोनों ओर गंगाजलके पात्र रखे हुए हैं ऐसी बहंगी कंधे पर रख कर, खुद इन
ब्राह्मणोंके बीचमें हो कर पर्वत पर चढ़ गया । किसीने उसके स्वरूपको नहीं जाना । [ ऊपर जा कर ]
गंगाजलसे श्री युगादि देव ( ऋषभनाथ ) को स्नान कराया और पर्वतके पासके बारह गाँवोंका शासन उस
१ ये जो वाक्य ऊपर अनूदित किये गये हैं, उनमेंका कितनाक कथन अस्पष्ट और अस्फुटार्थक है । जो अर्थ यहां पर
दिया गया है यह निर्भ्रान्त है ऐसा नहीं कह सकते ।