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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 181 में से

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पृष्ठ 100

Here is the accurate, line-by-line transcription of the Hindi and Sanskrit text from the provided image:

प्रकरण १०२-१०३ ] सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना [ ७५
[९८] मार्गणोंने तुम्हारे शत्रुओंके पास लक्ष (निशाना) पा लिया है और तुम्हारे पास वे विलक्ष
(निशानेसे रहित) हो कर रहे हैं। फिर भी हे सिद्धराज ! तुम्हारा 'दाता' पनका जो यश है वह ऊपर
सिर उठाये रह रहा है—बढ़ता चला जाता है !
*
इसके बाद, एक बार राजाने प्रथिलाचार्य जयमङ्गल सूरि से नगरवर्णन करनेको कहा। उन्होंने कहा—
[९९] मालूम होता है कि इस नगरीकी नागरिकाओंके चातुर्यसे निर्जित हो कर सरस्वती देवी है सो
हक्की-बक्की-सी हो कर अपनी कच्छपी न···ीणाको अपने बाहुसे उतार कर यहाँ पर छोड़ दी है और स्वयं पानी
वहन करने लगी है। उसकी इस वीणाका यह सहस्रलिंग सरोवर तो मानों तुंवा है और कीर्तिस्तंभ मानों
उसका उच्च दण्ड है।
१०३) इसके बाद, जब श्रीपालकविकी रची हुई सहस्रलिङ्गसरोवरकी प्रशस्ति, पट्टिका पर
लिखी गई तो उसके संशोधनके लिये सर्व दर्शनके (आचार्योंके) बुलाये जाने पर श्रीहेमचंद्राचार्यने
[अपने प्रधान शिष्य] रामचंद्र पण्डितको यह कह कर भेजा कि 'प्रशस्ति काव्य जो सभी विद्वानोंको
अनुमत हो तो उसमें अपना कुछ भी पाण्डित्य मत दिखाना।' फिर उन सब विद्वानोंने प्रशस्ति काव्यको
शोधनेकी दृष्टिसे पढ़ा और राजाके अनुरोधसे तथा श्रीपालकवि के चतुरतापूर्ण पाण्डित्यसे प्रसन्न हो कर
सारे काव्यको मान्य किया। उसमें भी उन सभीने निम्नलिखित काव्यकी विशेष प्रशंसा की—
१४५. “कोशसे युक्त होते हुए भी तथा दल (१ पत्ता, २ सेना) से समृद्ध हो कर भी यह कमल
अपने ही कण्टकोंके समूहको उच्छिन्न करनेमें असमर्थ है और इसके अतिरिक्त पुंस्त्व भी नहीं धारण करता।
(कमल शब्द पुंलिंग नहीं है) [दूसरी ओर सिद्धराज का जो कृपाण है] यह अकेला ही बिना कोश-
(म्यान) के भी भूतलको निष्कण्टक कर रहा है, ऐसा समझ कर लक्ष्मीने [अपने उस निवासस्थान रूप]
कमलको छोड़ कर इसके कृपाणका आश्रय लिया है।
इस विषयमें श्रीसिद्धराजने रामचंद्र से खास पूछा तो उसने कहा कि 'यह कुछ सदोष है।' उन सभी
पंडितोंसे पूछे जाने पर [उसने कहा कि] 'इस काव्यमें सेनाका वाचक 'दल' शब्द और कमल शब्दका
'नित्यक्लीबत्व' ये दो दोष चिन्तनीय हैं। तब उन सभी पंडितोंसे अनुरोध करके राजाने 'दल' शब्दको तो
सेनाके अर्थमें प्रमाणित कराया। किन्तु कमल शब्दका 'नित्यक्लीबत्व' जो लिङ्गानुशासनसे असिद्ध है उसे कौन
प्रमाणित कर सकता। इसलिये 'पुंस्त्वं च धत्ते न वा' (कभी पुंस्त्व धारण करता है, कभी नहीं) इस प्रकार
इस पदमें अक्षरभेद करवाया [जिससे वह अशुद्धि दूर हो गई]। उस समय रामचंद्रको सिद्धराज का
दृष्टिदोष लगा और वह ज्यों ही वसतिमें प्रवेश करने लगा त्यों ही उसकी एक आँख नष्ट हो गई।
*
१ इस श्लोकमें 'मार्गण' और 'लक्ष' शब्द पर श्लेष है। 'मार्गण' का एक अर्थ है बाण और दूसरा अर्थ है
मंगन=याचक। 'लक्ष' का एक अर्थ है लाख संख्या परिमित द्रव्य और दूसरा अर्थ है लक्ष्य=निशाना। मार्गणका अर्थ जब बाण
ऐसा विवक्षित है तब उसके साथ लक्षका अर्थ निशाना लेना होगा; और जब मंगन=याचक ऐसा अर्थ अपेक्षित होगा तब
लक्षका अर्थ लाख द्रव्य लेना होगा। सिद्धराजके मार्गण याने बाण विपक्ष याने शत्रुके पक्षमें लब्धलक्ष्य=निशाना प्राप्त करनेवाले
—होते हैं, कभी व्यर्थ नहीं जाते; और वे ही बाण (शत्रुके फेंके हुए) सिद्धराजके पक्षमें विलक्ष=लक्ष्यभ्रष्ट हो कर रह जाते हैं।
इससे विपरीत, मार्गण याने याचक लोग हैं वे सिद्धराजके पास लब्धलक्ष याने लाखोंका द्रव्य प्राप्त करते हैं और शत्रु
राजाओंके पास विलक्ष याने विगतलक्ष-बिनाही प्राप्तिके रह जाते हैं।