सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 94

चौथा अध्याय ग्रह बल ९३
(२३) प्रसिद्ध या विद्वान् कुल का, (२४) व्याख्या करने वाला, (२५)
शत्रुओं का नाश करने वाला, (२६) रोगी (२७) शत्रुओं से हराया
हुआ, (२८) जिसने अपना देश छोड़ दिया है, (२९) नौकर, (३०)
जिसका धन नष्ट हो गया है ।
(३१) राजसभा में रहने वाला, (३२) अच्छा मंत्री या विचार देने
वाला, (३३) दूसरे की पृथ्वी का स्वामी, (३४) पत्नी सहित, (३५)
हाथी से डरा हुआ, (३६) डरपोक, (३७) बहुत डरा हुआ, (३८) छिप-
कर रहने वाला, (३९) जो दूसरों को अन्न देता हो, (४०) अग्नि में
पड़ा हुआ ।
(४१) भूखा, (४२) अन्न खाता हुआ, (४३) भ्रमण करने वाला,
(४४) मांस खाने वाला, (४५) अस्त्र से जिसको घाव लगा है, (४६)
विवाहित, (४७) जिसके हाथ में गेंद है, (४८) जुआ खेलने वाला, (४९)
राजा, (५०) दुःखित ।
(५१) शय्या में लेटा हुआ, (५२) जिसकी सेवा शत्रु करें, (५३)
मित्र सहित, (५४) योगी, (५५) भार्या सहित, (५६) मिठाई खाने
वाला, (५७) दूध पीने वाला, (५८) अच्छे कर्म करने वाला, (५९)
स्वस्थ, (६०) सुखी ॥ १३-१५ ॥
चन्द्र-अवस्था फल
आत्मस्थानात्प्रवासो महितनृपहितो दासता प्राणहानि-
र्भूपालत्वं स्ववंशोचितगुणनिरतो रोग आस्थानवत्त्वम् ।
भीतिः क्षुद्बाधितत्वं युवतिपरिणयो रम्यशय्यानुषक्ति
र्मृष्टाशित्वं च गीता इति नियमवशात्सद्भिरिन्दोरवस्था ॥१६॥
(१) अपने घर से बाहर गया हुआ, (२) किसी बड़े राजा का
कृपा पात्र, (३) दासता से प्राण हानि, (४) भूपालत्व (राजत्व), (५)
अपने कुलोचित गुणों से युक्त, (६) रोग, (७) राज दरबार में होना,
(८) भय, (९) भूख से व्याकुल (१०) युवती से विवाह, (११) सुन्दर
शय्या में आराम की इच्छा, (१२) उत्तम भोजन करने वाला ॥ १६ ॥