फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय : ग्रह बल ८७
चाहे ग्रह अपनी नीच राशि या नीच अंश (नवांश) में भी हो यदि
वह वक्री है और सुन्दर किरण समूहों से पूर्ण है (अर्थात् अस्त नहीं है)
तो बली समझा जाता है। चन्द्रमा की तरह—ग्रह चाहे वह उच्च राशि
स्वराशि और मित्रराशि में भी क्यों न हो—यदि उसकी किरणें मर
गई हों (सूर्य के समीप होने के कारण) तो वह निर्बल होता है। भावार्थ
यह है कि चाहे वृष या कर्क का ही चन्द्रमा क्यों न हो यदि वह अमावास्या
का चन्द्र हो तो निर्बल है और चाहे वृश्चिक का ही चन्द्रमा क्यों न हो यदि
पूर्णिमा तिथि है तो वह बली है। यह सिद्धान्त अन्य ग्रहों पर भी लागू
करना चाहिये ।। ४ ।।
तुङ्गस्था बलिनोऽखिलाश्च शशिनः इलाघ्यं हि पक्षोद्भवं
भानोर्दिग्बलमाह वक्रगमने ताराग्रहाणां बलम् ।
कर्क्युक्षाजघटालिगोहिरबलान्त्योक्षाशिवपाश्चात्यगः
केतुस्तत्परिवेषधन्वसु बली चेन्द्रर्कयोगो निशि ।। ५ ।।
सब ग्रह तुंगी (उच्च) होने से बली होते हैं। चन्द्रमा के पक्ष-बल को
विशेष महत्त्व देना चाहिये। सूर्य के दिग्बल को मुख्यता है और अन्य ग्रहों
के वक्र बल की।
राहु, कर्क, वृषभ, मेष, कुंभ और वृश्चिक में तथा केतु, मीन कन्या
वृषभ और धनु के उत्तरार्द्ध में और परिवेष तथा इन्द्रचाप में बलवान्
होते हैं यदि रात्रि का समय हो और सूर्य तथा चन्द्र का योग हो (अर्थात्
सूर्य चन्द्र एक राशि में हों) ।
रूपं मानुषभेदलिभेडङ्घ्रिपरेष्वद्धं बलं स्यात्तनोः
तुल्यं स्वामिबलेन चोपचयगे नाथेऽतिवीर्योत्कटम् ।
स्वामीडचज्ञयुतेक्षिते कवियुते चान्यैरयुक्तेक्षिते
शर्वर्या 'निशि राशयोऽहनि परे वीर्यान्विताः कीर्तिताः ।।६।।