फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६५७
२. गोचरवश पहले यह निश्चय कीजिये कि किस ग्रह का शुभा-
शुभ आपको विचार करना है । मान लीजिये शनि का गोचर
विचार करना है। अब गोचर के समय (अर्थात् जिस समय का
विचार करता है । उस समय) शनि किस नक्षत्र में है यह देखिये ।
किसी भी नक्षत्र में ग्रह हो वह तीन प्रकार से वेध करता है :
(i) वाम दृष्टि से ।
(ii) दक्षिण दृष्टि से
(iii) सम्मुख दृष्टि से
(i) जब ग्रह वक्र होता है तब उसकी दक्षिण दृष्टि होती है ।
(ii) जब ग्रह 'शीघ्र' हो तो--अपनी स्वाभाविक गति (चाल)
से जल्दी चल रहा हो तो--वाम दृष्टि होती है ।
(iii) जब साधारण चाल से या मध्य गति से चल रहे हों
तो सम्मुख दृष्टि होती है ।
३. (i) किसी नक्षत्र में स्थिति ग्रह—वाम दृष्टि से वेध करता
है तो नक्षत्र, स्वर, वर्ण (अक्षर) आदि का वेध करता
है ।
(ii) इसी प्रकार किसी नक्षत्र में स्थित ग्रह दक्षिण दृष्टि से
नक्षत्र, स्वर, वर्ण (अक्षर) आदि का वेध करता है ।
(iii) किन्तु सम्मुख दृष्टि से नक्षत्र का वेध करता है । स्वर,
वर्ण आदि का नहीं करता ।
४. (i) उदाहरण के लिए मान लीजिये शनि रोहिणी में है
तो ब (अक्षर), मिथुन राशि, औ (स्वर), कन्या
(राशि) र (अक्षर) स्वाति (नक्षत्र) को वेध करता है ।
(ii) 'उ' स्वर, तथा अश्विनी (नक्षत्र) को वेध करता है ।
(iii) यदि मध्य गति (साधारण चाल) हुई तो सम्मुख दृष्टि
से केवल अभिजित् (नक्षत्र) का वेध करेगा ।