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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४९
शुक्र तीनों का एक ही क्रम और एक ही फल है । इस कारण एक
साथ बताया जाता है । जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने से ।
.(क) १, २, ३ नक्षत्रों में सिर में—फल-शोक ।
(ख) ४, ५, ६ नक्षत्र में चेहरे में-फल—लाभ ।
(ग) ७, ८, ९, १०, ११, १२ नक्षत्रों में-दोनों हाथों में-फल
अनर्थ ।
(घ) १३, १४, १५, १६, १७ में कुक्षि में –फल-धन लाभ ।
(ङ) १८, १९ चक्षत्र में गुह्य स्थान में –फल-नाश ।
(च) २०, २१, २२, २३, २४ २५ २६ २७ नक्षत्र में-दोनों पैरों
में-फल-प्रतिष्ठा ॥३८॥ '
भूवेदवह्निगुणवेदशराग्निनेत्र-
दस्रं च वक्त्रकरपादपदेषु हस्ते ।
कुक्षौ च मूर्ध्नि नयनद्वयपृष्ठभागे
न्यस्य क्रमेण शनिसंयुतभान्निजर्क्षात्॥३९॥
दुःखं च सौख्यं गमनं च नाशं
लाभं स्वभोगं सुखसौख्यमृत्यून् ।
वक्त्रक्रमादाह फलानि मन्द-
स्यैवं तमःखेचरयोर्वदन्तु ॥४०॥
अब शनि, राहु और केतु के नक्षत्र पुरुष के विविध अंगों में
भ्रमण का फल बताया जाता है। तीनों का फल एक सा है। इस
कारण एक साथ बताया जाता है। जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से
गिनने पर शनि, राहु या केतु :