फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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कालस्तु राहुर्गु लिकस्तु मृत्यु-
र्जीवातुकः स्याद्यमकण्टकोपि ।
अर्द्धप्रहारः शुभदः शुभाङ्क-
युक्तोऽन्यथा चेदशुभं विदध्यात् ॥२१॥ ,
आत्मादयोऽधिपैर्युक्ता धूमादिग्रहसंयुताः ।
ते भावा नाशतां यान्ति वदतीति पराशरः ॥२२॥
धूमे सन्ततमुष्णं स्यादग्निभीतिर्मनोव्यथा ।
व्यतीपाते मृगभयं चतुष्पान्मरणं तु वा ॥२३॥
परिवेषे जले भीरुर्जलरोगश्च बन्धनम् ।
इन्द्रचापे शिलाघातः क्षतं शस्त्रैरपि च्युतिः ॥२४॥
केतौ पतनघाताद्यं कार्यनाशोऽशनेर्भयम् ।
एते यद्भावसहितास्तद्दशायां फलं वदेत् ॥२५॥
(i) गुलिक के संयोग से सर्वत्र दोष होते हैं । ऊपर बता चुके हैं
कि छठे और ग्यारहवें भाव को छोड़कर जिस घर में गुलिक बैठता है
उसके शुभ फल को नष्ट करता है—अशुभ फल को बढाता है ।
(ii) यम कंटक का फल यह है कि जिस ग्रह के साथ यम
कष्टक बैठे उस ग्रह के शुभ फल को बढ़ावे-जिस भाव में यम कंटक
बैठे उस भाव के शुभ फल में वृद्धि करे ॥१८॥
(iii) दोष युक्त करने में—अशुभ फल बढ़ाने में गुलिक बलवान्
होता है । शुभ फल प्रदान करने में यम कंटक बली है । अन्य जो उपग्रह
हैं वह दुष्ट फल देने वाले हैं किन्तु जितना दुष्ट फल मान्दि देता है
अन्य ग्रह केवल उसका आधा दुष्ट फल देते हैं । मान लीजिये मान्दि