फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६०९
गुरुयुक्ते पाषण्डी शुक्रयुते नीचकामिनीसङ्गः ।
शनियुक्ते शनिपुत्रे कुष्ठव्याध्यर्दितश्च सोऽल्पायुः ॥१६॥
विषरोगी राहुयुते शिखियुक्ते वह्निपीडितो मान्दौ ।
गुलिकस्त्याज्ययुतश्चेत्तस्मिञ्जातो नृपोऽपि भिक्षाशी ॥१७॥
गुलिकस्य तु संयोगे दोषान्सर्वत्र निर्दिशेत् ।
यमकण्टकसंयोगे सर्वत्र कथयेच्छुभम् ॥१८॥
अब जन्म कुंडली में गुलिक के अन्य ग्रहों के साथ बैठने का फल
बताते हैं। गुलिक जिस ग्रह के साथ बैठता है प्रायः उस ग्रह को दूषित
करता है । सूर्य पिता का कारक है इसलिये यदि गुलिक सूर्य के साथ
बैठे तो जातक के पिता को मार दे अर्थात् पिता अल्पायु हो; चन्द्रमा
मातृ कारक है इसलिये यदि गुलिक चन्द्रमा के साथ बैठे तो जातक
की माता को कष्ट करे; मंगल भ्रातृ कारक है इसलिये मंगल के साथ
गुलिक बैठे तो भाई से वियोग करावे; बुध बुद्धि कारक है इस कारण
बुध और गुलिक एक साथ बैठे तो जातक को उन्माद--पागलपन का
रोग हो जाता है ॥१५॥
बृहस्पति धर्म कारक है; इस कारण यदि बृहस्पति और गुलिक
एक साथ हों तो जातक पाखंडी होता है। शुक्र स्त्रीकारक है और यदि
शुक्र तथा गुलिक एक साथ हों तो जातक नीच स्त्रियों के साथ
समागम करता है। यदि गुलिक शनि के साथ हो तो जातक कुष्ठ,
व्याधि आदि से पीड़ित और अल्पायु होता है ॥१६॥
यदि राहु और गुलिक एक साथ हों तो विष रोगी हो (किसी
प्रकार के विष के शरीर में उत्पन्न होने से जो रोग होते हैं) । यदि
केतु और गुलिक एक साथ हों तो जातक अग्नि से पीड़ित हो। यदि