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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 546, कुल 684 में से

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पृष्ठ 546

तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५४५
सूर्य १-२-४-७-८-१०-११ शनि का अष्टक वर्ग
चन्द्र ३-६-११
मंगल ३-५-६-१०-११-१२
बुध ६-८-९-१०-११-१२
बृहस्पति ५-६-११-१२
शुक्र ६-११-१२
शनि ३-५-६-११
लग्न १-३-४-६-१०-११
इस प्रकार शनि के अष्टक वर्ग में कुल ३९ शुभ बिन्दु पड़ते हैं :
सूर्य से ७, चन्द्र से ३, मंगल से ६, बुध से ६, बृहस्पति से ४, शुक्र से
३, शनि से ४, लग्न से ६ ॥९॥
इति निगदितमिष्टं नेष्टमन्यद्विशेषा-
दधिकफलविपाकं जन्मिनां तत्र दद्युः ।
उपचयगृहमित्रस्वोच्चगैः पुष्टमिष्टं
त्वपचयगृहनीचारातिगैर्नेष्टसम्पत् ॥१०॥
ऊपर अष्टक वर्गों में जहाँ-जहाँ शुभ बिन्दु डाले गये हैं वहां-वहां
जब गोचरवश ग्रह भ्रमण करेगा तब शुभ फल देगा । जिन स्थानों
का नाम नहीं लिया गया वहां-वहां अशुभ फल करेगा ऐसा समझना
चाहिये । उदाहरण के लिए सूर्य से १-२-४-७-८-१०-११ इन स्थानों पर
जब शनि गोचर वश आता है तब शुभ फल करता है यह ऊपर
श्लोक ९ में बताया गया है। उदाहरण कुंडली में (देखिये पृष्ठ ५३८)
सूर्य वृश्चिक राशि में है इस कारण सूर्य के विचार से वृश्चिक से १
वृश्चिक, २ धनु, ४ कुम्भ, ७ वृष, ८ मिथुन, १० सिंह, ११ कन्या ।