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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 487, कुल 684 में से

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पृष्ठ 487

बाईसवां अध्याय
मिश्रदशा
दस्रादितः पादवशेन मेषान्-
मीनांशकान्तं क्रमशोऽपसव्यम् ।
कीटाद्ध्यान्तं गणयेच्च सव्य-
मार्गेण पादक्रमशोऽजतारात् ॥१॥
(i) अश्विनी से तीन नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृत्तिका इनके
१२ चरण हुए । मेष, वृष, मिथुन, कर्क यह अश्विनी के ४ नवांश
हुए । सिंह, कन्या, तुला वृश्चिक यह भरणी के चार नवांश हुए ।
धनु, मकर, कुंभ, मीन यह चार नवांश कृत्तिका के हुए । इस क्रम से
१२ नवांशों से इन तीन नक्षत्रों को विभाजित कीजिये ।
(ii) रोहिणी से तीन नक्षत्र-रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा--इन तीन
नक्षत्रों के १२ नवांश हुए। इनको वृश्चिक से उलटा गिनकर—अर्थात्
वृश्चिक, तुला, कन्या, सिंह, कर्क, मिथुन, वृष, मेष, मीन, कुंभ, मकर,
धनु इन १२ नवांशों में विभाजित कीजिये । रोहिणी प्रथम चरण का
वृश्चिक, द्वितीय चरण का तुला.....इस क्रम से आर्द्रा चतुर्थ चरण
का धनु नवांश हुआ ।
एवं भूयाच्चापसव्यं च सव्यं
भानि त्रीणि त्रीणि विद्यात्क्रमेण ।
तद्राशीशप्रोक्तवर्षैर्दशास्य
देवं प्राहुः कालचक्रे महान्तः ॥२॥