फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें४४ फलदीपिका
मैत्री बताते हैं। जिस ग्रह का विचार करना हो उससे द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ,
दशम, एकादश, द्वादश स्थान में जो ग्रह होते हैं वे उसके मित्र होते हैं तथा
विचारणीय ग्रह से जो ग्रह प्रथम (उसी राशि में) पाँचवें, छठ, सातवें,
आठवें, नवें, घर होता है वह उसका शत्रु होता है। यह दो प्रकार
की मैत्री देखने के बाद यह नतीजा निकालना चाहिये कि परिणामतः
वे मित्र हुए, सम या शत्रु ।
(१) जो नैसर्गिक तथा तात्कालिक दोनों प्रकार से मित्र हों वे
अधिमित्र (अत्यन्त मित्र) हुए ।
(२) जो दोनों प्रकार से शत्रु हुए वे अधिशत्रु (अत्यन्त शत्रु) हुए।
(३) जो एक जगह मित्र और एक जगह शत्रु, वे सम (न शत्रु न
मित्र ) हुए ।
(४) जो एक जगह मित्र और दूसरी जगह सम वे मित्र हुए ।
(५) जो एक जगह शत्रु और दूसरी जगह सम वे शत्रु हुए।
इस प्रकार जन्मकुण्डली में मित्रामित्र चक्र बनाकर देखना चाहिये।
इसका प्रयोजन क्या ? जो अधिमित्र या मित्र के घर में होता है वह शुभ
फल देता है। क्रूर हो तो भी उतना खराब फल नहीं देता। जो शत्रु
या अधिशत्रु के घर में हो वह अच्छा फल नहीं देता, वह यदि शुभ ग्रह हो
तो भी उतना अच्छा फल नहीं देता। क्रूर ग्रह हो तो भी बहुत ही खराब
फल देगा।
ग्रहों की दृष्टि—कौन-सा ग्रह किस स्थान को किस दृष्टि से देखता
है यह नीचे के चक्र में बताया जाता है।
दृष्टिचक्र
पूर्ण त्रिपाद आधी चौथाई
सूर्य ७ ४, ८ ५, ९ ३, १०
चन्द्र ७ ४, ८ ५, ९ ३, १०
मंगल ४, ८, ७ ५, ९ ३, १०