फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३१
४. पहले और छठे के मालिक चन्द्रमा के साथ हों तो
जल से भय हो ।
५. पहले और छठे के, मालिक का मंगल से सम्बन्ध हों तो
व्रण, घाव, शस्त्र से आघात, ग्रन्थि (ऐसा फोड़ा जिसमें गांठ पड़
जाय जैसे प्लेग आदि) का भय होता है ।
६. पहले और छठे घर के मालिक बुध से युक्त हों तो
पित्त रोग ।
७. यदि पहले तथा छठे के मालिक बृहस्पति से युक्त हों तो
शरीर स्वस्थ रहे, रोग न हो ।
८. यदि पहले और छठे के मालिक शुक्र के साथ योग करें
तो जातक की स्त्री के स्वास्थ्य के लिये खराब है ।
९. यदि पहले और छठे के मालिक का शनि के साथ योग हो
तो चोरों ओर चाण्डालों (नीच जाति के लोगों) से भय हो ।
१० यदि पहले और छठे के मालिक राह या केतु से सम्बन्ध
करें तों सर्प, व्याघ्र आदि से भय हो ।
११. यदि छठे का मालिक नीच ग्रह के साथ बारहवें घर
में बैंठा हो और लग्न का स्वामी बलवान् हो तो रोग नाश होता
है अर्थात् स्वास्थ्य उत्तम रहता है ।
१२. यदि छठे घर का स्वामी लग्नेश से कमजोर हो और उस
षष्ठेश का शुभ ग्रहों से सम्बन्ध हो तो जातक के शत्रु उसके मित्र
हो जावेंगे ।
पत्नी विचार
इस तरंग में पत्नी विचार दिया गया है । यदि स्त्री की
कुण्डली में विचार करना हो तो नीचे दिये गये सिद्धान्तों पर पति
का विचार करना चाहिए । इसमें यह तारतम्य करना आवश्यक