फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२९
४. यदि चौथे घर के स्वामी के साथ शुक्र चौथे घर में बैठा
हो तो स्वल्प वाहन योग होता है।
५. यदि चौथे घर के स्वामी के साथ शुक्र नवम, दशम या
एकादश स्थान में बैठा हो तो बहुत वाहन योग करता है ।
६. यदि कर्क लग्न हो, बुध और शुक्र चौथे घर में हो तो बुध
की दशा शुक्र की अन्तर्दशा में वाहन प्राप्त होता है ।
७. यदि शुक्र सप्तम में हो तो जातक बहुत कामुक होता है ।
अर्थात् उसकी भोग लालसा प्रग्ल होती है ।
८. यदि चौथे घर में शनि हो तो जातक कठोर हृदय होता
है । किन्तु नये भवन में नहीं रहता और परदेश में रहता है।
९. यदि चौथे घर का स्वामी नवें घर में हो और नवें घर
घर का स्वामी चौथे घर में हो तो यह भाग्य योग और वाहन योग
भी उत्पन्न करते हैं ।
१०. यदि चौथे घर का स्वामी 'ग्यारहवें हो और ग्यारहवें घर
का स्वामी चौथे हो तो भी ऊपर जो नं० ९ में फल बताया गया
है वही फल होता है ।
११. चौथे घर का मालिक पाँचवें और पाँचवें घर के मालिक
चौथे हो तो भी भाग्य योग तथा वाहन योग होते हैं ।
१२. यदि चौथे घर का स्वामी लग्न में हो और लग्नेश चौथे घर
में हो तो भी शुभ फल समझना चाहिए ।
१३. यदि पाँचवें घर का मालिक नवम में हो और नवम
घर का मालिक पाँचवें हो तो भी यही फल हो ।
१४. यदि चौथे घर का मालिक चौथे और पाँचवें घर का
मालिक पाँचवें हो तो भी भाग्य वाहन योग होता है ।
१५. यदि पाँचवें घर का मालिक लाभ में और लाभ का
मालिक पाँचवें हो तो भी भाग्य योग करता है । लाभ ग्यारहवें घर
को कहते हैं ।