फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल २०५
भावसमांशकसंस्था भावफलं पूर्णमेव कलयन्ति ।
न्यूनाधिकांशवशतः फलवृद्धिर्ह्रासिता वाच्या ॥३५॥
इसमें वही बात समझायी गई है जो हम ऊपर बता चुके हैं ।
ग्रह का भाव फल विचार करना हो तो यह देखिये कि वह भाव मध्य
से कितनी दूर है । भाव मध्य के जितने समीप होगा उतना ही उस
भाव सम्बन्धी विशेष फल करेगा । भाव मध्य से जितना दूर होगा
उतना ही उस भाव सम्बन्धी कम फल करेगा ।