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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 684 में से

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पृष्ठ 204

वियोग हो। अंतड़ियों का रोग हो और धातु (बीयं) रोग भी हो।
हमारा अनुभव है कि जिसके सप्तम में केतु हो उसकी पत्नी रोगिणी
रहती है। यदि अष्टम में केतु हो तो इष्ट (प्रियजनों) का विरह हो,
कलह करे और जातक स्वल्पायु हो। अष्टम में केतु वाले को प्रायः
शस्त्र से चोट लगती है और उसके सब उद्योगों में विरोध होता है।
यदि केतु नवम भाव में हो तो पाप प्रवृत्ति वाला, अशुभ कर्मा,
पितृहीन, भाग्यहीन, दरिद्री, और सज्जनों की निन्दा करने वाला होता
है। यदि दशम में केतु हो तो सत्कर्म करने में अनेक विघ्न आवें या
जातक स्वयं सत्कर्म में विघ्न उपस्थित करे, ऐसा व्यक्ति अत्यन्त तेजस्वी
और अपनी शूर वीरता के लिए प्रसिद्ध हो। किन्तु ऐसा व्यक्ति दुष्ट
कर्मा और अशुद्ध होता है।
यदि लाभ स्थान में केतु हो तो उत्तम द्रव्य वाला, द्रव्य संग्रह करने
वाला, अनेक गुणान्वित, उत्तम भोगों से युक्त होता है। ऐसे व्यक्ति के
पास बहुत से भोग्य पदार्थ रहते हैं और सब कार्यों में उसे सिद्धि प्राप्त
होती है। द्वादश भावस्थ केतु का अनिष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति गुप्त
रूप से पाप करता है और दुष्ट कार्यों में धन व्यय करता है। ऐसे
व्यक्ति प्रायः अपना धन नष्ट कर देते हैं और जो सज्जनोचित कार्य का
मार्ग है, उससे विरुद्ध चलते रहते हैं। ऐसे लोगों को नेत्र रोग भी
होता है।
उदयर्क्षांशस्फुटतुल्यांशे निवसन् पूर्णं फलमाधत्ते ।
शनिवद्राहुः कुजवत्केतुः फलदाता स्यादिह संप्रोक्तः ॥३४॥
ऊपर जो विविध ग्रहों के भाव फल बताये गये हैं उनके विषय में
कुछ विशेष कहते हैं। लग्न के जितने अंश गये हों उतने ही अंश का
जब कोई ग्रह राशि में हो तो उस भाव का पूर्ण फल देता है।
उदाहरण के लिये कुण्डली नं० (१) में लग्न का एक अंश है। और
शनि भी पञ्चम में एक अंश का है, तो पंचम भाव का पूर्ण फल