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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 684 में से

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पृष्ठ 199

१९८ फलदीपिका
कहने का तात्पर्य यह है कि कोई ग्रह अच्छा ही फल करेगा
या निकृष्ट ही फल करेगा यह किसी एक बात से निश्चय नहीं कर
लेना चाहिये। २४ प्रकार के बल होते हैं। उन सब का तथा अष्टक
वर्ग में शुभ रेखा, सर्वाष्टक वर्ग की रेखा, ग्रह आरोही है या अवरोही,
उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि है या पाप ग्रहों की, किस भाव में है--
भाव मध्य से कितनी दूर है—किस नक्षत्र में है—उस नक्षत्र का स्वामी
कौन सा ग्रह है—वह ग्रह किन राशियों और किन भावों का स्वामी
है—कहाँ बैठा है—उस पर किन ग्रहों की दृष्टि है आदि अनेक बातों
का तारतम्य कर बुद्धिमान् ज्योतिषी को ग्रह का प्रभाव निश्चित
करना चाहिये ।
यदि दशम में शनि हो तो उत्कृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति राजा
हो या शाजा का मन्त्री हो, अत्यन्त धनी, प्रसिद्ध और शूर हो और कृषि
कार्य में तत्पर हो। पहले कृषि कार्य सबसे उत्तम व्यवसाय माना
जाता था इसीलिये ऐसा लिखा है। आधुनिक समय में इसका अर्थ
करना चाहिये कि उत्तम व्यवसाय करे। यदि ग्यारहवें घर में शनि हो
तो आय सहित, शूर, निरोगी (स्वस्थ), धनी, दीर्घायु और स्थिर सम्पत्ति
वाला हो। बारहवें भाव में शनि हो तो अनिष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति
निर्लज्ज, धन हीन, पुत्र से वंचित, विकलांग (शरीर के किसी भाग में
विकलता) और मूर्ख होता है। उसके शत्रु उसे उत्सारित (दूर
फेंकना) कर देते हैं। हमारा अनुभव है कि द्वादश में शनि दाँतों को
भी खराब करता और नेत्रों को भी हानि पहुंचाता है।
अब राहु का विविध भाव फल बताते हैं
लग्नेऽह्नावचिरायुर्थबलावानूर्ध्वाङ्गरोगान्वित-
श्छन्नोक्तिर्मु खरूघृणी नृपधनी वित्ते सरोषः सुखी ।
मानी भ्रातृविरोधको दृढमतिः शौर्ये चिरायुर्धनी
मूर्खो वेश्मनि दुःखकृत्सुहृदल्पायुः कदाचित्सुखी ॥२५॥