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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 684 में से

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पृष्ठ 187

१८६ फलदीपिका
पीड़ित, मार्ग चलने वाला और मृत दारावान् (जिसकी स्त्री मर जाय)
होता है ।
सप्तम पत्नी का स्थान है । सप्तम में मंगल होने से जातक
प्रबल मंगलीक होते है इस कारण उनकी पत्नी मर जावे यह लिखा है।
किन्तु यदि पत्नी भी मंगलीक हो तो-दोनो (पति-पत्नी) के मंगलीक
होने से यह दोष नहीं होता । अर्थात् इस दोष की निवृत्ति हो जाती है ।
जिस मनुष्य की कुंडली मंगलीक हो उसे मंगलीक कन्या से ही विवाह
करना चाहिये तथा जो कन्या मंगलीक हो उसका विवाह मंगलीक वर
से ही करना उचित है ।
मंगल, शनि, राहू केतु, सूर्य यह पाँच ग्रह क्रूर हैं । लग्न से, द्वितीय,
(दूसरा घर कुटुम्ब स्थान कहलाता है । पत्नी 'कुटुम्ब' का प्रधान
केन्द्रीय स्तभ है यदि केन्द्रीय स्तभ टूट जावे तो शामियाना गिर पड़ता
है । इस प्रकार यदि पत्नी नष्ट हो जावे तो कुटुम्ब कैसे बढ़ेगा) चतुर्थ
(चतुर्थ सुख स्थान है घर का विचार भी चौथे घर से करते हैं ।
गृहिणी-घर वाली ही न रहे तो घर कैसा ? चतुर्थ में मंगल 'घर' का
सुख नष्ट करता है) सप्तम (पत्नी का स्थान), अष्टम (लिंग मूल से
गुदावधि अष्टम भाव होता है इस भाग का पत्नी से सम्बन्ध स्पष्ट है ।
व्याख्या की आवश्यकता नहीं । पत्नी की कुंडली में इस स्थान का
पति से सम्बन्ध सुस्पष्ट है । विवरण व्यर्थ है), तथा द्वादश (बारहवाँ
घर "शयन सुख" कहलाता है शय्या का परम सुख कान्ता है। बारहवें
में मंगल शयन की सुख हानि करता है-इस कारण ) इन पांच स्थानों में
क्रूर ग्रह मंगल, शनि राहू, केतु, सूर्य जिस भाव में हों उस भाव
सम्बन्धी सुख की कमी करने के कारण-इनका विचार जन्म कुंडली, चन्द्र
कुंडली (चन्द्रमा जिस राशि में हो उसे लग्न मान) तथा शुक्र से (शुक्र
'काम' का अधिष्ठाता है-सप्तम भाव का कारक है इसलिये वैवाहिक
सुख विचार में शुक्र का महत्व है) करना चाहिये ।