फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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(पीने की वस्तु) आदि का भी विचार किया जाता है। और दूसरा
स्थान तथा दूसरे स्थान के स्वामी के बलवान् होने से ऐसे व्यक्ति को
उत्तम भोजन, पेय पदार्थ, विद्या, बड़े कुटुम्ब का सुख, आदि प्राप्त होंगे।
दक्षिण भारत में दूसरे घर से भी विद्या का विचार किया जाता है।
वास्तव में दूसरा घर मुख, जिह्वा या वाणी का है। वाणी और विद्या
में बहुत समानता है।
(३) यदि तृतीय भाव में शुभ ग्रह हों या इस भाव को शुभ ग्रह
देखते हों और तृतीय भाव का स्वामी अस्त न हो और अपनी राशि या
उच्चराशि में स्थित होकर उत्तम स्थान में हो तो 'शौर्य' योग होता है;
ऐसा व्यक्ति बहुत पराक्रमी होता है और उसके छोटे भाई
यशस्वी, और भ्रातृभक्त होते हैं। इसके भाई लोग जातक
की प्रशंसा भी करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि तृतीय स्थान का
भाई बहिन, पराक्रम सम्बन्धी पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति
स्वयं भी बहुत यशस्वी होता है और राज्य कार्य में निरत रहता है।
फलितार्थ यह है कि अच्छे सरकारी ओहदे पर आसीन होता है।
मन्त्रेश्वर महाराज ने तो यह भी लिखा है कि “राम” के समान पराक्रमी
हो किन्तु इसे अर्थवाद समझना चाहिए।
(४) यदि चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हों या शुभ ग्रह चौथे स्थान
को देखते हों, चतुर्थेश अस्त न हो और अपनी स्वराशि या
उच्चराशि में स्थित होकर उत्तम स्थान में हो तो अम्बुधि या
जलधि योग होता है। अम्बुधि या जलधि समुद्र को कहते हैं। इस
- संस्कृत में राम के तीन अर्थ हैं परशुराम, रामचन्द्र और
बलराम—तीनों ही बड़े पराक्रमी थे। - अर्थवाद का अर्थ है किसी बात की बहुत प्रशंसा करना। जहाँ
अर्थवाद हो वहाँ अक्षरशः अर्थ न लेकर भावार्थ मात्र लेना चाहिये यह
संस्कृत शास्त्रों की परिपाटी है।