फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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कोई से दो ग्रहों के) परस्पर स्थान परिवर्तन का फ़ल बताया गया है ।
परन्तु उत्तर कालामृत में छठे, आठवें तथा बारहवें के मालिक तीनों दुः-
स्थान* में हों, परस्पर युत (सहित) या ईक्षित (एक दूसरे से देखे जाते)
हों और अन्य किसी शुभ स्थान के स्वामियों से सम्बन्ध न करें यह
आवश्यक शर्त लगाई गई है ।
अस्तु, उत्तर कालामृत के इस श्लोक का हवाला तो प्रसंग वश दे
दिया गया है । अब प्रस्तुत विषय पर आइये । शुभ स्थानों के स्वामियों
के परस्पर स्थान परिवर्तन से जो महायोग कहे गये हैं उनके उदाहरण
में कुछ जन्म कुण्डलियाँ नीचे दी जाती हैं ।
नीचे श्रीमती इन्दिरा गांधी की जन्म कुण्डली दी जा रही है । इनका
जन्म प्रयाग में सूर्योदय के ४१ घड़ी ५२ पल २३ विपल बाद १९ नवम्बर
१९१७ को हुआ । स्पष्ट लग्न और स्पष्ट ग्रह निम्नलिखित हैं :—
लग्न ३-२७°-१३'
सूर्य ७-४°-८'
चन्द्र ९-५°-३७'
मंगल ४-१६°-२३'
बुध ७-१३°-१५'
बृहस्पति १-१५°-१' वक्री
शुक्र ८-२१°-०,
शनि ३-२१°-४७'
राहु ८-१०°-३३'
केतु २-१०°-३३'
इनकी जन्म कुण्डली में लग्नेश सप्तम में तथा सप्तमेश में लग्न है,
यह एक महायोग हुआ । द्वितीयेश पंचम में, पंचमेश द्वितीय में है।
यह दूसरा महायोग हुआ । किन्तु षष्ठेश लाभ में और लाभेश षष्ठ में
है यह दैन्य योग है ।
- ६, ८, १२ स्थान को दुः स्थान कहते हैं ।