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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 684 में से

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पृष्ठ 116

छठा अध्याय : योग ११५
ऊपर के श्लोकों में सूर्य के अतिरिक्त कोई ग्रह चन्द्रमा से द्वितीय,
द्वादश या दोनों घरों में हो या न हो ऐसे योग बताये हैं। अब सूर्य से
द्वितीय, द्वादश या इन दोनों घरों में कोई ग्रह (चन्द्रमा के अतिरिक्त)
हो तो क्या योग होते हैं यह बताते हैं।
(१) सूर्य से द्वितीय, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, इनमें से
एक या अधिक ग्रह हों तो शुभवेसि योग होता हैं।
(२) यदि सूर्य से द्वादश मंगल, बुध, बृहस्पति शुक्र, शनि कोई
ग्रह हो तो शुभवासि योग होता है।
(३) यदि इन पांचों ग्रहों में से एक या अधिक सूर्य से द्वादश
में हो और एक या अधिक सूर्य से द्वितीय में हो तो उभयचरी योग
होता है। उभयचरी का अर्थ है दोनों ओर। किसके ? सूर्य जिस राशि में
में है उस राशि के दोनों ओर चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य ग्रह होने से
यह शुभ योग बनता है।
ऊपर जो तीन योग दिये गये हैं वे प्रायः सब ज्योतिष की पुस्तकों
में उपलब्ध होते हैं परन्तु इस सम्बन्ध में मन्त्रेश्वर महाराज कुछ
विशेष निर्देश करते हैं। यदि शुभ ग्रह सूर्य के एक या दोनों ओर योग बनावें
तो उनके मत से शुभवेसि, शुभवासि तथा शुभ उभयचरी योग हुआ।
किन्तु यदि शुभ ग्रह के बजाय पाप ग्रह योग बनावें तो क्रमशः पापवेसि
पापवासि तथा पाप उभयचरी योग हुए।
जैसे सूर्य के एक ओर या दोनों ओर ग्रह होने से योग बताये हैं
वैसे ही लग्न से भी विचार करना चाहिये। यदि लग्न के दोनों ओर
(द्वितीय और द्वादश में) पाप ग्रह हों तो पाप कर्त्री योग हुआ। किन्तु
यदि लग्न के दोनों ओर अर्थात् द्वितीय स्थान तथा द्वादश स्थान में शुभ
ग्रह बैठे हों तो शुभ कर्त्री हुआ।
यदि द्वितीय में (लग्न से दूसरे) शुभ ग्रह बैठा हो और इस शुभ
ग्रह को कोई पाप ग्रह नहीं देखता हो तो सुशुभ नामक योग होता है।
स्मरण रहे कि लग्न से द्वितीय में अच्छा योग बताया गया है। लग्न