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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 684 में से

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पृष्ठ 104

पाँचवाँ अध्याय : कर्माजीव प्रकरण १०३
हुई, इसका स्वामी सूर्य हुआ । यह मान लीजिये २६° का वृश्चिक में है।
इस कारण कुम्भ नवांश में होने से (क्योंकि वृश्चिक राशि में २३°-२०'
से २६°-४०' तक कुम्भ नवांश होता है) सूर्य का नवांशेश शनि हुआ
(क्योंकि कुम्भ का स्वामी शनि होता है) । इस कारण शनि स्वभाव,
शनि प्रकृति, शनि स्वरूप, शनि सम्बन्धित व्यापार, कार्य, पदार्थों से
जातक को लाभ होगा। अब तीसरा उदाहरण लीजिये। मान लीजिये
चन्द्रमा सबसे बलवान् है । तो चन्द्रमा से दशम धनु राशि हुई। धनु का
स्वामी बृहस्पति हुआ। अब यदि बृहस्पति कन्या में १५° का है तो
पञ्चम नवांश में होने के कारण वृष नवांश में हुआ (क्योंकि कन्या
राशि में १३°-२०' से १६°-४०' तक वृष का नवांश रहता है) जिसका
स्वामी शुक्र है। इस कारण शुक्र की आकृति, प्रकृति, स्वरूप, स्वभाव,
गुण, धर्म वाले व्यक्तियों से तथा शुक्र से सम्बन्धित व्यापारों से लाभ
होगा। ऊपर यह बताया गया है कि लग्न सूर्य और चन्द्रमा उनसे
दशम राशि के स्वामी के नवांश के स्वामी के अनुसार धन लाभ
होता है । क्या इनमें (लग्न, सूर्य, चन्द्र में) जो सबसे बली हों केवल
उससे विचार किया जाय ? बहुत से ज्योतिषियों का मत है कि तीनों
से विचार करना चाहिये क्योंकि किसी-किसी को तो एक ही प्रकार
से धन लाभ होता है और किसी-किसी को अनेक उपायों और
मार्गों द्वारा धन प्राप्ति होती रहती है ।
फलद्रुमैर्मन्त्रजपैश्च शाठ्याद्द्यूतानृतैः कंबलभेषजाद्यैः ।
धातुक्रियाद्वा क्षितिपालपूज्याज्जीवत्यसौ पङ्कजवल्लभांशे ॥२॥
जलोद्भवानां क्रयविक्रयेण कृषिक्रियागोमहिषीसमुत्थैः ।
तीर्थाटनाद्वा वनिताश्रयाद्वा निशाकरांशे वसनक्रयाद्वा ॥ ३ ॥