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सर्वकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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समाधिपाद-१ १३

उसके चित्तका प्रवाह समानभावसे अपने ध्येयके अनुभवमें एकाग्र हो जाता है (योग० ३ । १२) उसके बाद समाधि परिपक्व होनेपर प्रकृति और पुरुषविषयक विवेकज्ञान प्रकट होता है (योग० ३ । ३५); उसके होनेसे जब साधककी तीनों गुणोंमें और उनके कार्यमें किसी प्रकारकी किञ्चिन्मात्र भी तृष्णा नहीं रहती; (योग० ४ । २६) जब वह सर्वथा आप्तकाम निष्काम हो जाता है (योग० २ । २७), ऐसी सर्वथा रागरहित अवस्थाको 'परवैराग्य' कहते हैं* ॥१६॥

**सम्बन्ध—**इस प्रकार चित्तवृत्ति-निरोधके उपायोंका वर्णन करके अब चित्तवृत्तिनिरोधरूप निर्बीज योगका स्वरूप बतलानेके लिये पहले उसके पूर्वकी अवस्थाका संप्रज्ञात योगके नामसे अवान्तर भेदोंके सहित वर्णन करते हैं—

वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्संप्रज्ञातः॥१७॥

'वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता—इन चारोंके सम्बन्धसे युक्त चित्तवृत्तिका समाधान संप्रज्ञात योग है।'

**व्याख्या—**संप्रज्ञातयोगके ध्येय पदार्थ तीन माने गये हैं— (१) ग्राह्य (इन्द्रियोंके स्थूल और सूक्ष्म विषय), (२) ग्रहण (इन्द्रियाँ और अन्तःकरण) तथा (३) ग्रहीता (बुद्धिके


* गीतामें भी योगारूढ-अवस्थाका वर्णन करते हुए कहा है—
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ (६।४)
'जब योगी न तो इन्द्रियोंके विषयोंमें और न कर्मोंमें ही आसक्त होता है तथा सब प्रकारके संकल्पोंका भलीभाँति त्याग कर देता है, तब वह योगारूढ़ कहलाता है।'