सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 23

समाधिपाद-१ ७

सम्बन्ध- अब विकल्पवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं—

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥

'जो ज्ञान शब्दजनित ज्ञानके साथ-साथ होनेवाला है और जिसका विषय वास्तवमें है ही नहीं, वह विकल्प है।'

व्याख्या— केवल शब्दके आधारपर बिना हुए पदार्थकी कल्पना करनेवाली जो चित्तकी वृत्ति है, वह विकल्पवृत्ति है। यह भी यदि वैराग्यकी वृद्धिमें हेतु, योगसाधनोंमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाली तथा आत्मज्ञानमें सहायक हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।

आगम प्रमाणजनित वृत्तिसे होनेवाले संकल्पोंके सिवा सुनी-सुनायी बातोंके आधारपर मनुष्य जो नाना प्रकारके व्यर्थ संकल्प करता रहता है, उन सबको विकल्पवृत्तिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये।

विपर्ययवृत्तिमें तो विद्यमान वस्तुके स्वरूपका विपरीत ज्ञान होता है और विकल्पवृत्तिमें अविद्यमान वस्तुकी शब्दज्ञानके आधारपर कल्पना होती है, यही विपर्यय और विकल्पका भेद है।

जैसे कोई मनुष्य सुनी-सुनायी बातोंके आधारपर अपनी मान्यताके अनुसार भगवान्‌के रूपकी कल्पना करके भगवान्‌का ध्यान करता है; पर जिस स्वरूपका वह ध्यान करता है, उसे न तो उसने देखा है और न वैसा कोई भगवान्‌का स्वरूप वास्तवमें है ही, केवल कल्पनामात्र ही है। यह विकल्पवृत्ति मनुष्यको भगवान्‌के चिन्तनमें लगानेवाली होनेसे अक्लिष्ट है; दूसरी जो भोगोंमें प्रवृत्त करनेवाली विकल्पवृत्तियाँ हैं, वे क्लिष्ट हैं। इसी प्रकार सभी वृत्तियोंमें क्लिष्ट और अक्लिष्टका भेद समझ लेना चाहिये ॥९॥

सम्बन्ध— अब निद्रावृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं—