सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

समाधिपाद-१ [५]

और इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष नहीं है एवं जहाँ अनुमानकी भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका ज्ञान वेद, शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंसे होता है, वह आगमसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिस आगम प्रमाणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है, (गीता ५। २२) और योगसाधनोंमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है; और जिस आगम-प्रमाणसे भोगोंमें प्रवृत्ति और योगसाधनोंमें अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके भोगोंकी बड़ाई सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और प्रवृत्ति होती है, वह क्लिष्ट है ॥७॥

सम्बन्ध—प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं—

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥

'जो उस वस्तुके स्वरूपमें प्रतिष्ठित नहीं है, ऐसा मिथ्या ज्ञान विपर्यय है।'

व्याख्या—किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना—यह विपरीत ज्ञान ही विपर्यय-वृत्ति है—जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति। यह वृत्ति भी यदि भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।

जिन साधनोंसे यथार्थ ज्ञान होता है, उन्हींसे विपरीत ज्ञान भी होता है। यह मिथ्या ज्ञान भी कभी-कभी भोगोंमें वैराग्य करनेवाला हो जाता है। जैसे भोग्य पदार्थोंकी क्षणभङ्गुरताको देखकर, अनुमान करके या सुनकर उनको सर्वथा मिथ्या मान लेना योग-

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित) · पृष्ठ 21, कुल 184 में से · SarvaKosh