पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ७१ )
तद्यदि मम सतीत्वमस्ति मनसापि परपुरुषो नाभिल-
षितः ततो देवा भूयोऽपि मे नासिकां तादृग्रूपामक्षतां
कुर्वन्तु । अथवा यदि मम चित्ते परपुरुषस्य भ्रान्तिरपि
भवति मां भस्मसान्नयन्तु” । एवमुक्त्वा भूयोऽपि तमाह—
“भो दुरात्मन् ! पश्य मे सतीत्वप्रभावेण तादृशी एव
नासिका संवृत्ता” । अथ असा उल्मुकमादाय यावत्पश्यति
तावत् तद्रूपां नासिकाञ्च भूतले रक्तप्रवाहञ्च महान्तमप-
श्यत् । अथ स विस्मितमनास्तां बन्धनाद्विमुच्य शय्यायामा-
रोप्य च चाटुशतैः पर्य्यतोषयत् । देवशर्मा अपि तं सर्ववृत्ता-
न्तमालोक्य विस्मितमना इदमाह—
सो यदि मेरा सतीत्व है और मनसेभी परपुरुषका अभिलाष नहीं
कियाहै तो देवता फिरभी मेरी नासिकाको उसी प्रकारकी अक्षत करदें । अथवा
यदि मेरे चित्तमें परपुरुषकी भ्रान्तिभी हो तो मुझको भस्म करदें”। यह कह फिर
उससे बोली,—“भो दुरात्मन् ! देख मेरे सतीत्वके प्रभावसे फिर वैसीही नासिका
होगई” तब यह दीपक लेकर देखनेलगा तो उसी प्रकारकी उसकी नासिका
और पृथ्वीमें रक्तप्रवाह बहुत देखता भया। तब यह विस्मितमन होकर उस बन्ध-
नसे खोल शय्यामें आरोपणकर सैकडों मनोहर वचनोंसे उसको सन्तुष्ट करता-
हुआ । देवशर्माभी इस सब वृत्तान्तको देखकर विस्मयको प्राप्त होकर यह बोला-
“शम्बरस्य च या माया या माघा नमुचेरपि ।
बलेः कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः ॥ १९४ ॥
“जो शम्बरकी मायाहै, जो नमुचिकी मायाहै, बलि और कुम्भीनसकी जो
मायाहै वे सब माया स्त्रियें जानतीहैं ॥ १९४ ॥
हसन्तं प्रहसन्त्येता रुदन्तं प्ररुदन्त्यपि ।
अप्रियं प्रियवाक्यैश्च गृह्णन्ति कालयोगतः ॥ १९५ ॥
यह हँसते हुएके साथ हँसती, रोते हुएके साथ रोती, समय योगसे अनुरक्त
जनको प्रियवचनोंसे ग्रहण करती हैं ॥ १९५ ॥
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः ।
स्त्रीबुद्ध्या न विशिष्येत तस्माद्रक्ष्याः कथं हि ताः ॥ १९६॥