पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रूहि तं कामिनं यदस्यां रात्रौ न त्वया सह समागमः” ।
नापिती प्राह- “सखि । मामैवं वद । न अयं कुलटाधर्मः ।
उक्तञ्च-
वहभी यह वचन सुन प्रतिकूल वचन और बालोंका बिखरना देख उससे
बोला- “पुंश्चलि ! बहुत दिनोंमें मैंने तेरा अपवाद सुनरखा है, सो आजदिन
स्वयं देखकर विश्वास आगया है अब तेरा यथोचित दण्ड करता हूं,” वह कह
लकड़ीके प्रहारसे उसकी जर्जरित देह ( चूर्ण ) करके स्तम्भमें दृढ बांधकर
मदविह्वल हो निद्राके वशीभूत हुआ, इसी समय उसकी सखी नायन कौलिकको
निद्राके वशीभूत हुआ जानकर जाकर उससे यों बोली--“सखी देवदत्त उस
स्थानमे तेरी वाट देख रहा है सो शीघ्र जाओ” वह बोली-, “मेरी अवस्था तो देख
भला मै कैसे जासक्ती हूं ? सो तूही जाकर उस कामीसे कह आजकीरात तुम्हारे
सग समागम न होगा” नायन बोली--“सखी ऐसा मत कह, यह कुलटाओंका
धर्म नहीं है । कहा है-
विषमस्थस्वादुफलग्रहणव्यवसायनिश्चयो येषाम् ।
उष्ट्राणामिव तेषां मन्येऽहं शंसितं जन्म ॥ १९० ॥
कठिन स्थानमें स्थित स्वादु फलके ग्रहण करनेका जिनका निश्चय है
उन्हीका जन्म मैं ऊंटोंकी समान प्रशंसित मानती हूं ॥ १९० ॥
तथाच-
तैसेही-
सन्दिग्धे परलोके जनापवादे च जगति बहुचित्रे ।
स्वाधीने पररमणे धन्यास्तारुण्यफलभाजः ॥ १९१ ॥
परलोकमें सन्देह है, जनापवाद चित्र विचित्र होता है, दूसरेसे रमण करना
स्वाधीन है युवावस्थाके फल भोगनेवाली स्त्री धन्य हैं ॥ १९१ ॥
यदि भवति दैवयोगात्पुमान् विरूपोऽपि बन्धकीरहसि ।
न तु कृच्छ्रादपि भद्रं निजकान्तं सा भजत्येव ॥ १९२ ॥
औरभी यदि दैवयोगसे पुरुष कुरूपभी एकान्तमे प्राप्तहो तथापि वह कष्टको
प्राप्त हुई सुन्दरभी अपने पतिका भजन नहीं करती है ॥ १९२ ॥