पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वागतेनाग्नयस्तृप्ता आसनेन शतक्रतुः ।
पादशौचेन पितर अर्घाच्छम्भुस्तथातिथिः ॥ १८३ ॥
आइये ऐसा कहनेसे अग्नि, आसनसे इन्द्र, चरणधोनेसे पितर और अति-
थिके अर्घ देनेसे शिवजी प्रसन्न होजातेहै ॥ १८३ ॥
कौलिकोऽपि तच्छ्रुत्वा भार्यामाह-“प्रिये ! गच्छ
त्वमतिथिमादाय गृहं प्रति । पादशौचभोजनशयना-
दिभिः सत्कृत्य त्वं तत्रैव तिष्ठ । अहं तव कृते प्रभूतं मद्य-
मानेष्यामि” । एवमुक्त्वा प्रस्थितः । सापि भार्या पुंश्चली
तमादाय प्रहसितवदना देवदत्तं मनसि ध्यायन्ती गृहं प्रति
प्रतस्थे । अथवा साधु चेदमुच्यते-
कौलिकभी यह वचन सुन अपनी स्त्रीसे बोला-“हे प्रिये ! तू इस अति-
थिको लेकर घर जा चरणधोना भोजन शयनादिसे सत्कार करके घरही रह,
और मैं तेरे निमित्त बहुतसी मद्य लाताहू” । यह कह चला । यह उसकी
भार्या व्यभिचारिणी उसको ले हँसतीहुई देवदत्तका मनमे ध्यान करतीहुई
घरको चली । अथवा सत्य कहाहै-
दुर्दिंवसे घनतिमिरे दुःसञ्चरासु घनवीथिषु ।
पत्युर्विदेशगमने परमसुखं जघनचपलायाः ॥ १८४ ॥
मेघसे आच्छादित दिनमें, घन अंधकारमे, जहा किसीका प्रवेश न हो ऐसी
गलियोमे, पतिके विदेश जानेमें, चपलजंघा (रतिप्रिया) स्त्रियोंको परम सुख
होताहै ॥ १८४ ॥
तथाच-
तैसेही-
पर्यङ्केष्वास्तरणं पतिम्रनुकूलं मनोहरं शयनम् ।
तृणमिव लघु मन्यन्ते कामिन्यश्चौर्यरतलुब्धाः ॥१८५॥
पलंगपर सोना, पतिकी अनुकूलता, तथा मनोहर शयनको भी चौर्रतिकी
लालची स्त्रियें तृणकी समान लघु मानतीहैं ॥ १८५ ॥
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