पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
आलिंगन किया है ? '' । गोरम्भ बोला- “ देव ! रात्रिमें द्यूत खेलनेके कारण
जागरण करनेसे मुझे बहुत निद्रा होरहीहै, सो मुझे विदित नहीं कि, मैंने क्या
कहा”। राजाने ( ईर्ष्यासे मनमें ) कहा-“यह हमारे घरमें बेरोकटोक आने-
वाला है और दन्तिलभी, सो इसने कभी देवी आलिङ्गित होती देखी होगी,
इसकारण यह कहता है । कहाहै-
यद्वाञ्छति दिवा मर्त्यो वीक्षते वा करोति वा ।
तत्स्वप्नेऽपि तदभ्यासाद् ब्रूते वाथ करोति वा ॥ १४४ ॥
जो मनुष्य दिनमें इच्छा करता, देखता वा करताहै उसके अभ्याससे वह
स्वप्नमेंभी वही बोलता या करताहै ॥ १४४ ॥
तथाच-
औरभी-
शुभं वा यदि वा पापं यन्नृणां हृदि संस्थितम् ।
सुगूढमपि तज्ज्ञेयं स्वप्नवाक्यात्तथा मदात् ॥ १४५ ॥
अच्छा या बुरा जो मनुष्योके हृदयमें स्थितहे वह स्वप्नवाक्यसे अथवा
मदसे गुप्त बातभी विदित होजाती है ॥ १४५ ॥
अथवा स्त्रीणां विषये कोऽत्र सन्देहः ?
अथवा स्त्रियोंके विषयमें क्या सन्देह है ?
जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं साविभ्रमाः ।
हृद्गतं चिन्तयन्त्यन्यं प्रियः को नाम योषिताम् ॥ १४६ ॥
किसीके साथ बोलतीहैं, किसीको विलासपूर्वक देखतीहैं, हृदयमें प्राप्तहुए
अन्यको विचार करतीहैं कहो, स्त्रियोंको कौन प्याराहै ॥ १४६ ॥
अन्यच्च-
औरभी-
एकेन स्मितपाटलाधररुचो जल्पन्त्यनल्पाक्षरं
वीक्षन्तेऽन्यमितः स्फुटत्कुमुदिनीफुल्लोल्लसल्लोचनाः ।
दूरोदारचरित्रचित्रविभवं ध्यायन्ति चान्यं धिया
केनेत्थं परमार्थतोऽर्थवदिव प्रेमास्ति वाम भ्रुवाम् ॥ १४७ ॥