पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५१२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
ऐसा कहकर अन्धेने जाकर उस पटहको स्पर्श किया । "भो ! मैं उस
कन्याको विवाहूंगा जो राजा मुझे कन्याको देगा"। तब उन राजपुरुषोंने राजा-
से जाकर कहा-"देव ! किसी अन्धेने वह घोषणाका बाजा छुआ है। सो
इसमें देवही प्रमाण है"। राजा बोला,-
अन्धो वा बधिरो वापि कुष्ठी वाप्यन्त्यजोऽपि वा ।
प्रतिगृह्णातु तां कन्यां सलक्षां स्याद्विदेशजः ॥ ९९ ॥"
अन्धा, बहरा, कुष्ठी, अन्त्यज ( नीच ) कोईहो लाख अशरफी सहित
कन्याको ग्रहण करे और देशसे बाहर हो ॥ ९९ ॥"
अथ राजादेशात् तैः रक्षापुरुषैः तं नदीतीरे नीत्वा सुव-
र्णलक्षेण समं विवाहविधिना त्रिस्तनीं तस्मै दत्त्वा जल-
याने निधाय कैवर्त्ताः प्रोक्ताः-“भोः ! देशान्तरं नीत्वा
कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने अन्धः सपत्नीकः कुब्जकेन सह
मोचनीयः” । तथानुष्ठिते विदेशम् आसाद्य कस्मिंश्चित्
अधिष्ठाने कैवर्त्तदर्शिते त्रयोऽपि मूल्येन गृहं प्राप्ताः सुखेन
कालं नयन्ति स्म, केवलम् अन्धः पर्य्यङ्के सुप्तः तिष्ठति ।
गृहव्यापारं मन्थरकः करोति, एव गच्छता कालेन त्रिस्त-
न्याः कुब्जकेन सह विकृतिः समपद्यत । अथवा साधु इद-
मुच्यते,-
तब राजाकी आज्ञासे उन राजपुरुषोंने उसे नदीके किनारे लेजाकर लाख
सुवर्णके साथ ही विवाह विधिसे वह तीन स्तनकी कन्या उसे देकर नावमें
बैठाय मल्लाहोंसे कहा-“भो ! इन्हें देशान्तरमें लेजाकर किसी स्थानमें स्त्रीसहित
अन्धे कुबडेको छोडदो” ऐसा करनेपर विदेशको प्राप्त हो कैवर्तकके दिखाये किसी
स्थानमें वे तीनों मूल्यके साथ घरको प्राप्त हुए सुखसे समयको बिताने लगे ।
केवल अन्धा पलंगके ऊपर सोताही रहता । घरका कार्य्य कुबडा करता इस
प्रकार समय जाते त्रिस्तनीके साथ लगडेका व्यभिचार प्रगट हुआ । अथवा
यह अच्छा कहा है-
यदि स्याच्छीतलो वह्निश्चन्द्रमा दहनात्मकः ।
सुस्वादुः सागरः स्त्रीणां तत्सतीत्वं प्रजायते ॥ १०० ॥
जो अग्नि शीतल चन्द्रमा जलनेवाला और सागर स्वादिष्ट हो तौ
कदाचित् स्त्रियोंमें सतीत्व होजाय ॥ १०० ॥