सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 517, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 517

(५०२) पञ्चतन्त्रम् ।
अथ तत्सरः समासाद्य वानरः प्रत्यूषसमये राजानम्
उवाच,-“देव ! अर्द्धोदिते सूर्य्येऽत्र प्रविष्टानां सिद्धिर्भ-
वति । तत्सर्वोऽपि जन एकदा एव प्रविशतु, त्वया पुनर्मया
सह प्रवेष्टव्यं येन पूर्वदृष्टस्थानम् आसाद्य प्रभूतास्ते रत्न-
माला दर्शयामि”। अथ प्रविष्टाः ते लोकाः सर्वे भक्षिता
राक्षसेन । अथ तेषु चिरायमाणेषु राजा वानरमाह,-“भो
यूथाधिप ! किमिति चिरायते मे जनः ?” । तत् श्रुत्वा
वानरः सत्वरं वृक्षम् आरुह्य राजानम् उवाच,-“भो दुष्टनर-
पते ! राक्षसेन अन्तःसलिलस्थितेन भक्षितस्ते परिजनः
साधितं मया कुलक्षयजं वैरम्, तत् गम्यताम् । त्वं स्वामीति
मत्वा न अत्र प्रवेशितः । उक्तञ्च-
तब उस सरोवरको प्राप्त होकर वानर प्रभातकालमें राजासे बोला,-“देव !
यहां आधे उदय होते सूर्यके प्रवेश करनेवालोंको सिद्धि होगी। सो सबही मनुष्य
एक साथ प्रवेश करें, आप पीछे मेरे साथ प्रवेश करना जिससे पूर्वमें देखे
स्थानको प्राप्त होकर बहुतसी रत्नमाला तुमको दिखाऊंगा”। तब प्रवेश कियेहुए
वे लोक सब उस राक्षसने खालिये तब उनके देर करनेपर राजा वानरसे बोला,-
“भो यूथाधिप ! क्या कारण है जो हमारे जन देर करते है ?” । यह सुनकर
वानर शीघ्र वृक्षपर चढकर राजासे बोला-“भो दुष्ट राजन्। भीतर जलके स्थित
हुए राक्षसने तुम्हारे परिजन भक्षण किये । मैंने अपने कुलक्षयसे उत्पन्न हुआ
वैर साधन किया । सो जाओ स्वामी जानकर इसमें तुम्हें प्रवेश न कराया ।
कहा है कि-
कृते प्रतिकृतिं कुर्य्याद्धिंसिते प्रतिहिंसितम् ।
न तत्र दोषं पश्यामि दुष्टे दुष्टं समाचरेत् ॥ ८५ ॥
उपकारवालेके संग उपकार करे, हिंसावालेके संग हिंसा करे, दुष्टके संग
दुष्टता करे, इसमें मै दोष नहीं देखता हूं ॥ ८५ ॥
तत्त्वया मम कुलक्षयः कृतो मया पुनस्तव” इति । अथ
एतदाकर्ण्य राजा कोपाविष्टः पदातिः एकाकी यथायातमा-
र्गेण निष्क्रान्तः । अथ तस्मिन् भूपतौ गते राक्षसः तृप्तो
जलात् निष्क्रम्य सानन्दमिदमाह,-