पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४९६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
अभावसे कभी जलती लकडीसे ताडन किया तो तौ बहुत ऊनवाला यह मेष
स्वल्प अग्निसेभी जल जायगा । सो यह जलता हुआ समीपवर्ती अश्वशालामें
प्रवेश करेगा । वहभी तृणके अधिक होनेसे प्रज्वलित हो जायगी । तब घोडे
अग्निसे जल जांयगे । अश्वशास्त्रके ज्ञाताने कहाहै वानरोंकी चरबीसे घोडोंका
अग्निदोष शान्त होताहै । सो अवश्यही यह होगा निश्चयहै । ऐसा निश्चयकर
सब वानरोंको बुलाकर एकान्तमें बोला । कि-
मेषेण सूपकाराणां कलहो यत्र जायते ।
स भविष्यत्यसन्दिग्धं वानराणां क्षयावहः ॥ ७५ ॥
जहां मेषके साथ सूपकारोंका क्लेश होताहै वह अवश्य वानरोंके क्षयके
निमित्त होताहै ॥ ७५ ॥
तस्मात्स्यात्कलहो यत्र गृहे नित्यमकारणः ।
तद्गृहं जीवितं वाञ्छन्दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ७६ ॥
इस कारण जहां घरमें नित्य अकारण क्लेश होतारहे, जीनेकी इच्छा करने-
वाला दूरसेही उस घरको त्यागन करदे ॥ ७६ ॥
तथाच-
और देखो-
कलहान्तानि हर्म्याणि कुवाक्यान्तञ्च सौहृदम् ।
कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मान्तं यशो नृणाम् ॥ ७७ ॥
कलहसे स्थान नष्ट होजातेहैं, कुवाक्यसे मित्रता नष्ट होजातीहै, कुराजासे
देश नष्ट होजाते हैं, कुकर्मोंसे मनुष्योंके यश नष्ट होजातेहैं ॥ ७७ ॥
तन्न यावत् सर्वेषां संक्षयो भवति तावदेतत् राजगृहं
सन्त्यज्य वनं गच्छामः” । अथ तत् तस्य वचनम् अश्रद्धेयं
श्रुत्वा मदोद्धता वानराः प्रहस्य प्रोचुः-“भो ! भवतो वृद्ध-
भावात बुद्धिवैकल्यं सञ्जातं येन एतद्ब्रवीषि । उक्तञ्च-
सो जबतक सबका सक्षय न हो तबतक यह राजगृह छोडकर वनको
चलें” । तब उसके बचनको श्रद्धाके अयोग्य सुनकर मदसे उद्धत हुए वानर
हँसकर बोले-“भो ! आपको वृद्धतासे बुद्धिकी विकलता प्राप्त हुईहै जिससे
ऐसा कहतेहो । कहा है-