पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४८९ )
राजा दानपरो नित्यमिह कीर्तिमवाप्य च ।
तत्प्रभा वात्पुनः स्वर्गे स्पर्द्धते त्रिदशैः सह ॥ ६२ ॥
नित्य दान करनेवाला राजा इस लोकमे कीर्तिको प्राप्त होकर उसके प्रभा-
वसे फिर स्वर्गमे देवताओँसे स्पृहा किया जाता है ॥ ६२ ॥
कौलिक आह-'अस्ति एतत्परं तथापि गृहिणीं पृच्छा-
मि" । स आह- "भद्र ! शास्त्रविरुद्धमेतत् यत् स्त्रिया सह
मन्त्रः, यतस्ताः स्वल्पमतयो भवन्ति, उक्तञ्च-
कौलिक बोला- "है तो योही परन्तु अपनी स्त्रीसे पूछू" । वह बोला,-
'भद्र ! यह शास्त्रके विरुद्ध है जो कि स्त्रीसे सम्मति करनी कारण कि, वह
स्वल्प बुद्धिवाली होती हैं। कहा है-
भोजनाच्छादने दद्यादृतुकाले च सङ्गमम् ।
भूषणाद्यञ्च नारीणां न ताभिर्मन्त्रयेत्सुधीः ॥ ६३ ॥
उनको भोजन आच्छादन दे ऋतुकालमे सङ्गम करे तथा उनको भूषण दैदे
परन्तु उनके साथ सम्मति न करे ॥ ६३ ॥
यत्र स्त्री यत्र कितवो बालो यत्राप्रशासितः ।
तद्गृहं क्षयमायाति भार्गवो हीदमब्रवीत् ॥ ६४ ॥
जहा स्त्री अप्रशासित ( अशिक्षित ) है जहा दुर्जन और बालकको शासना
नही वह घर क्षय होजाता है, ऐसा भार्गव ऋषिने कहा है ॥ ६४ ॥
तावत्स्यात्सुप्रसन्नास्यस्तावद्गुरुजने रतिः ।
पुरुषो योषितां यावन्न शृणोति वचो रहः ॥ ६५ ॥
जबतक यह एकान्तमे स्त्रीजनोंके वचन नही सुनता है तभीतक इसकी गुरु-
जनोंमें रति है तभीतक प्रसन्न मुख है ॥ ६५ ॥
एताः स्वार्थपरा नार्य्यः केवलं स्वसुखे रताः ।
न तासां वल्लभः कोऽपि सुतोऽपि स्वसुखं विना ॥ ६६ ॥"
यह स्वार्थमें तत्पर स्त्री केवल अपने सुखमेंही रत रहती हैं अपने सुखके
विना उनको कोई प्यारा नहीं बहुत क्या पुत्रभी नहीं ॥ ६६ ॥"
कौलिक आह,-"तथापि प्रष्टव्या सा मया, यतः पति-
व्रता सा। अपरं तामपृष्ट्वा अहं न किञ्चित्करोमि। एवं तमभि-
धाय सत्वरं गत्वा तां उवाच,-"प्रिये ! अद्य अस्माकं