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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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( ४७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

र्जनार्थं कान्यकुब्जे गताः, तत्र च विद्यामठे गत्वा पठन्ति ।
एवं द्वादशाब्दानि यावत् एकचित्ततया विद्याकुशलास्ते सर्वे
सञ्जाताः । ततः तैः चतुर्भिर्मिलित्वा उक्तम्-“वयं सर्व-
विद्यापारे गताः । तदुपाध्यायम् उत्कलापयित्वा स्वदेशे
गच्छामः”।”तथैव क्रियताम्” इत्युक्ता ब्राह्मणा उपाध्याय-
मुत्कलापयित्वा अनुज्ञां लब्ध्वा पुस्तकानि नीत्वा प्रचलिताः।
यावत् किञ्चित् मार्गं यान्ति तावत् द्वौ पन्थानौ समायातौ ।
उपविष्टाः सर्वे । तत्रैकः प्रोवाच,–“केन मार्गेण गच्छामः ?”
एतस्मिन् समये तस्मिन् पत्तने कश्चित् वणिक्पुत्रो मृतः
तस्य दाहार्थे महाजनो गतोऽभूत् । ततः चतुर्णां मध्यात्
एकेन पुस्तकम् अवलोकितम्-“महाजनो येन गतः स
पन्थाः” इति “तत् महाजनमार्गेण गच्छामः” । अथ ते
पण्डिता यावत् महाजनमेलापथिकेन सह यान्ति तावत्
रासभः कश्चित् तत्र श्मशाने दृष्टः । अथ द्वितीयेन पुस्तकम्
उद्घाट्य अवलोकितम्-
किसी स्थानमें चार ब्राह्मण परस्पर मित्र रहतेथे । बालकभावमेंही उनकी
यह बुद्धि हुई कि,–“भो ! देशान्तरमें जाकर विद्या उपार्जन करना चाहिये”।
तब और दिन वे ब्राह्मण परस्पर निश्चय करके विद्या उपार्जनके निमित्त कन्नो-
जको गये । वहां विद्यालयमें जाकर पढने लगे । इस प्रकार बारह वर्षमें एक
चित्तसे विद्या पढनेमें ये सब विद्यामें कुशल हुए । तब उन चारोंने मिलकर कहा-
“हम सब विद्याके पार हुए सो उपाध्यायको संतुष्ट कर अपने देशको जांय” ।
“ऐसाही करो” यह कहकर वे ब्राह्मण उपाध्यायको सन्तुष्ट कर उनकी आज्ञा लेकर
पुस्तकें लेकर चले । जबतक कुछ मार्गमें जाते हैं कि तबतक दो मार्ग आये ।
सब बैठ गये । उनमें एक बोला,-“किस मार्गसे जांय ?” । इसी समय उस
नगरमें कोई वणिक्पुत्र मरगया । उसके दाहके निमित्त महाजन जाते थे । तब
चारोंके बीचमें एकने पुस्तक खोल कर कहा--“जिसमें बहुतसे लोग गमन
करते हैं वही मार्ग है इससे महाजनोंके मार्गसे गमन करें” । तब वे महाजन
जब महाजनके संग मार्गमें जाने लगे । तबतक श्मशानमें कोई गधा देखा । तब
दूसरेने पुस्तक खोलकर देखा कि-