पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (४५१)
रक्षा करता हू । पर तो भी जबतक कि सिंह नहीं आता है, तबकत इस
हाथीका मास भक्षण कर तृप्तिको प्राप्त होकर शीघ्र जा” । वह बोला-“मामां !
जो ऐसा है तो मुझे मासभक्षणसे प्रयोजन नहीं, कारण कि जीता रहे तो
मनुष्य सेकडों मगलोंको देखता है । कहा है कि-
यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रासं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् ।
हितञ्च परिणामे यत्तदाद्यं भूतिमिच्छता ॥ ७८ ॥
मनुष्य जो ग्रास ग्रसनेको समर्थ हो और जो खानेसे पच जाय परिणाममें
हितकारी हो ऐश्वर्य्यकी इच्छा करने वालेको वह भोजन करना चाहिये ॥ ७८ ॥
तत सर्वथा तदेव भुज्यते यदेव परिणमति । तत् अहमितोऽपयास्यामि” । शृगाल आह,-“भो अधीर ! विश्रब्धो
भूत्वा भक्षय त्वं, तस्य आगमनं दूरतोऽपि तव अहं निवेदयिष्यामि” । तथा अनुष्ठिते द्वीपिना भिन्नां त्वचं विज्ञाय
जम्बूकेन अभिहितम्-“भो भगिनीसुत ! गम्यताम्, एष सिंहः
समायाति” । तत् श्रुत्वा चित्रको दूरं प्रविष्टः । अथ यावदसौ
तद्भेदकृतद्वारेण किंचिन्मांसं भक्षयति, तावत् अतिसंक्रुद्धोऽपरः शृगालः समाययौ । अथ तम् आत्मतुल्यपराक्रमं
दृष्ट्वा एनं श्लोकमपठत-
सो जो पचजाय सर्वथा उसीको खाना अच्छा है । सो मैं यहासे जाता हूं”।
शृगाल बोला-“भो अधीर ! निडर होकर तू भक्षण कर । उसका आगमन
दूरसेभी मैं तुझसे कहदूगा” । ऐसा करने पर शार्दूलसे खाल फाडी हुई
जानकर शृगालने कहा-“भो भानूजे ! जाओ यह सिंह आरहाहै”। यह सुन
चित्रक दूर भाग गया । सो जबतक यह उस भेदन किये द्वारसे मास खाने
लगा तबतक अतिक्रोध किये दूसरा शृगाल आया तब उसने अपनी तुल्य पराक्रममें उसे जानकर यह श्लोक पढा-
उत्तमं प्रणिपातेन शूरं भेदेन योजयेत् ।
नीचमल्पप्रदानेन समशक्तिं पराक्रमैः ॥ ७९ ॥
उत्तमको प्रणाम कर, शूरको भेद करके, नीचको कुछ देकर और समान
शक्तिको पराक्रमसे युक्त करे ॥ ७९ ॥