पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 426, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (४११)
गंगदत्तने काले सर्पको खखोडलमे धरकर उन दायादोको दिखाया वे उसने
शनैः २ खालिये । तब मण्डूकोंका अभाव देखकर सर्पने कहा-“भद्र ! तुम्हारे
*शत्रु तो निःशेष होगये सो मुझे कुछ और भोजन दो, जो कि तुम मुझे यहा
लाये हो” । गंगदत्त बोला-“मित्र ! तुमने मित्रका कार्य किया है । सो अब
इसी ढेकलीके मार्गसे जाओ” । सर्प बोला-“भो गंगदत्त ! तुमने अच्छा नहीं
कहा कैसे मैं वहां जाऊ । मेरा बिलदुर्ग औरोंने घेर लिया होगा इस कारण यहीं
स्थित हुए मुझे एक एक मेढक अपने कुटुम्बका दो । नहीं तो सबको खाजा-
ऊंगा” यह सुन गंगदत्त व्याकुल मनसे विचारने लगा । “अहो ! सर्पको लाकर
यह मैंने क्या किया । सो यदि निषेध करू तो यह सबहीको खाजायगा ।
अथवा युक्त कहा है-
योऽमित्रं कुरुते मित्रं वीर्याभ्यधिकमात्मनः ।
स करोति न सन्देहः स्वयं हि विषभक्षणम् ॥ २५ ॥
जो अपने पराक्रमसे अधिक अमित्रको मित्र करता है इसमें सन्देह नहीं
वह स्वयंही विष भक्षण करता है ॥ २५ ॥
तत् प्रयच्छामि अस्य एकं दिनं प्रतिसुहृदम् । उक्तञ्च-
सो प्रतिदिन इसको मै एक एक सुहृद दू । कहा है-
सर्वस्वहरणे युक्तं शत्रुं बुद्धियुता नराः ।
तोषयन्त्यल्पदानेन वाडवं सागरो यथा ॥ २६ ॥
बुद्धिमान् मनुष्य सर्वस्व हरण करनेमें युक्त हुए शत्रुको अल्प दानसे
सन्तुष्ट करे जैसे सागर वडवा अग्निको प्रतिदिन अल्प जल देताहै ॥ २६ ॥
तथाच-
और देखो-
यो दुर्बलोऽप्यूनमपि याच्यमानो
बलीयसा यच्छति नैव साम्ना ।
प्रयच्छते नैव च दर्शमानं
खारीं स चूर्णस्य पुनर्ददाति ॥ २७ ॥
जो दुर्बल प्रबलकी सात्वनापूर्वक याचना करनेपर अल्पभी प्रदान नहीं
करता है तथा दर्शमानभी नहीं देता है वह डाटनेसे चूर्णके स्थानमें खारी