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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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(४००) पञ्चतन्त्रम् ।
कण्ठाश्लेषपरिग्रहे शिथिलता यन्नादराच्चुम्बसे
तत्ते धूर्त्त! हृदि स्थिता प्रियतमा काचिन्ममैवापरा ॥७॥”
न अच्छी प्रकार मुझसे बोलते हो, न वांछित देते हो, जलती अग्निकी
समान रात्रिमें प्रायः श्वास लेते हो, कंठके आलिंगन करनेमें शिथिलता करते
हो, न आदरसे चुम्बन करते हो, इससे हे धूर्त ! मैने जाना कि तुम्हारे हृदयमें
मेरेसमान कोई अन्यस्त्री है ॥ ७ ॥”
सोऽपि पत्न्याः पादोपसंग्रहं कृत्वा अङ्कोपरि निधाय
तस्याः कोपकोटिमापन्नायाः सुदीनमुवाच-
वह भी स्त्रीके चरण पकड़ कर गोदीमें रख अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुई स्त्रीसे
दीन हो बोला-
ः "मयि ते पादपतिते किङ्करत्वमुपागते ।
त्वं प्राणवल्लभे कस्मात्कोपने कोपमेष्यसि ॥ ८ ॥”
"मुझे तेरे चरणोंपर गिरने तथा दीनताको प्राप्त होनेमें भी हे प्राणप्यारी !
हे कोपने ! किस कारण तू क्रोध करती है ॥ ८ ॥”
सा अपि तद्वचनमाकर्ण्य अश्रुप्लुतमुखी तमुवाच-
यह इस वचनको सुनकर आंसुओंसे मुखको भिगोती उससे बोली-
"सार्द्धं मनोरथशतैस्तव धूर्त्त कान्ता
सैव स्थिता मनसि कृत्रिमभावरम्या ।
अस्माकमस्ति न कथञ्चिदिहावकाश-
स्तस्मात्कृतं चरणपातविडम्बनाभिः ॥ ९ ॥
हे धूर्त ! सैकडो मनोरथोंकेसाथ कपटसे मन हरने वाली वह कान्ता तेरे
मनमें स्थित है । इस हृदयमें हमारे निमित्त स्थान नहीं है सो अब चरणपातकी
विडम्बनासे कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ ९ ॥
अपरं सा यदि तव वल्लभा न भवति तत् किं मया भणि-
तेऽपि तां न व्यापादयसि ? । अथ यदि स वानरस्तत् कः
तेन सह तव स्नेहः ? तत् किंबहुना यदि तस्य हृदयं न भक्ष-
यामि, तत् मयाः प्रायोपवेशनं कृतं विद्धि” । एवं तस्याः तं
निश्चयं ज्ञात्वा चिन्ताव्याकुलितहृदयः स प्रोवाच-अथवा
साधु इदमुच्यते-