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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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( ३८६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
यह अनेक मेंडक मैंने छलसे साधे हैं, मुझसे भक्षण कियेभी कितने काल-
-तक अक्षीण होंगे ( दीर्घकालमें खा चुकूंगा ) ॥ २४८ ॥
जलपादोऽपि मन्दविषेण कृतकवचनव्यामोहितचित्तः
किमपि नावबुध्यते । अत्रान्तरेऽन्यो महाकायः कृष्णसर्पः
तमुद्देशं समायातः । तञ्च मण्डूकैः वाह्यमानं दृष्ट्वा विस्मय-
मगमत् । आह च, - "वयस्य ! अस्माकमशनं तैः कथं वाह्यसे
विरुद्धमेतत्" । मन्दविषोऽब्रवीत्-
और जलपादभी मन्दविष सर्पके बनावटी वचनोंसे मोहित चित्त होकर कुछभी
न जानता हुआ, इसी समय और महा शरीरवाला कृष्ण सर्प वहां आया ।
उस पहले सर्पको मण्डूकोंसे वाह्यमान देखकर विस्मयको प्राप्त हुआ । बोलाभी
"भो मित्र ! जो हमारा भोजन है उसे कैसे शिरपर वहन करतेहो ? । यह तो
विरुद्ध है"। मन्दविष बोला-
"सर्वमेतद्विजानामि यथा वाह्योऽस्मि दर्दुरैः ।
किञ्चित्कालं प्रतीक्ष्योऽहं घृतान्धो ब्राह्मणो यथा २४९॥"
"यह सब मैं जानता हूं जिस कारण मेडकोंको वहन करता हूं मैं घृतसुने
द्रव्यसे अन्धे ब्राह्मणकी समान कुछ कालकी प्रतीक्षा करता हूं ॥ २४९ ॥"
सोऽब्रवीत्, - "कथमेतत् ?" मन्दविषः कथयति-
वह बोला,- "यह कैसे ?" मन्दविष कहने लगा-
कथा १६.
अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने यज्ञदत्तो नाम ब्राह्मणः, तस्य
भार्य्या पुंश्चली अन्यासक्तमना अजस्रं विटाय सखण्डघृतान्
घृतपूरान् कृत्वा भर्तुश्चौरिकया प्रयच्छति ।
किसी स्थानमें यज्ञदत्तनामवाला ब्राह्मण रहता था उसकी भार्या व्यभिचा-
रिणी ओरमें मन लगाये हुए निरन्तर मित्र (जार) के लिये खांडघृतके
सहित घृतपूर बनाकर स्वामीसे चुराकर उसे देती ।
अथ कदाचित् भर्त्ता दृष्ट्वा अब्रवीत्,- " भद्रे ! किमेतत्
परिदृश्यते ? कुत्र वा अजस्रं नयसि इदम् ? कथय सत्यम्"
सा च उत्पन्नप्रतिभा कृतकवचनैः भर्त्तारमब्रवीत्- "अस्ति