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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३६६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जिसके रज प्राप्त नहो वह गौरी, रज प्राप्त होनेमें रोहिणी जबतक चिन्ह
प्रगट न हुएहों वह कन्या, कुच उदय न होनेतक नग्निका कहाती है ॥२१२॥
व्यञ्जनैस्तु समुत्पन्नैः सोमो भुंक्ते हि कन्यकाम् ।
पयोधराभ्यां गन्धर्वा रजस्याग्निः प्रतिष्ठितः ॥ २१३ ॥
चिन्होंके उत्पन्न होनेपर चन्द्रमा कन्याको भोगता है पयोधर होनेपर
गंधर्व और रज उत्पन्न होने पर अग्नि उसको भोगता है ॥ २१३ ॥
तस्माद्विवाहयेत्कन्यां यावन्नर्तुमती भवेत् ।
विवाहश्चाष्टवर्षायाः कन्यायास्तु प्रशस्यते ॥ २१४ ॥
इस कारण जबतक ऋतुमती नहो तबतक कन्याको विवाह दे आठ वर्षकी
कन्याका विवाह करना अच्छा है ॥ २१४ ॥
व्यञ्जनं हन्ति वै पूर्वं परं चैव पयोधरौ ।
रतिरिष्टांस्तथा लोकान्हन्याच्च पितरं रजः ॥ २१५ ॥
स्त्रीचिन्ह प्रगट होनेपर पूर्व पुण्यको नाशते हैं, स्तनप्राप्तिपरभी विवाह न
होने पर परत्र लभ्य पुण्यका नाश होता है सुरत योग्य होनेसे स्वर्गादिलोंकोंको
और रजोवती होनेसे पितरोंको नरकमे डालती है स्त्री व्यंजन (चिन्ह) से पह-
लेही कन्यादान करना चाहिये ॥ २१५ ॥
ऋतुमत्यां तु तिष्ठन्त्यां स्वेच्छादानं विधीयते ।
तस्मादुद्वाहयेन्नग्नां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ २१६ ॥
ऋतुमती कन्याके होनेमें कन्याकी अनुमतिसे दान करे इस कारण नग्ना (रजो-
रहित) कन्याको विवाह करे ऐसा स्वायंभुमनुने कहा है ॥ २१६ ॥
पितृवेश्मनि या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता ।
अविवाह्या तु सा कन्या जघन्या वृषली स्मृता ॥ २१७ ॥
जो कन्या पिताके घर बिनाविवाहित हुई रज दर्शन करती है वह कन्या
विवाहके अयोग्य शूद्रावत् होती है ॥ २१७ ॥
श्रेष्ठेभ्यः सदृशेभ्यश्च जघन्येभ्यो रजस्वला ।
पित्रा देया विनिश्चित्य यतो दोषो न विद्यते ॥ २१८ ॥
रजस्वला कन्या जिस प्रकार दोष नहो सो विचार कर श्रेष्ठ सदृश और अध-
मोंमें ( नहीं ) जो श्रेष्ठ हों उनको देनी चाहिये (१) ॥ २१८ ॥
१ एक नव युवकाभ्यासी वृथा उपाधि धारीने ऐसे श्लोकोंका आशय और तत्व न
जानकर वृथाही जल्पना प्रकाशकी है सो त्याज्य है ।