पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३४४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
एष शाकुनिकः शेते तवावासं समाश्रितः ।
शीतार्त्तश्च क्षुधार्त्तश्च पूजामस्मै समाचर ॥ १६८ ॥
यह पक्षीका पकड़नेवाला तुम्हारे स्थानमें प्राप्त हुआ सोता है और भूखसे
व्याकुल है तू इसका सत्कार कर ॥ १६८ ॥
श्रूयते च-
सुना है कि-
यः सायमतिथिं प्राप्तं यथाशक्ति न पूजयेत् ।
तस्यासौ दुष्कृतं दत्त्वा सुकृतं चापकर्षति ॥ १६९ ॥
संध्याके समय प्राप्त हुए अतिथिको जो यथाशक्ति पूजन नहीं करता है
उसको यह अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चला जाता है ॥ १६९ ॥
मा चास्मै त्वं कृथा द्वेषं बद्धानेनेति मत्प्रिया ।
स्वकृतैरेव बद्धाहं प्राक्तनैः कर्मबन्धनैः ॥ १७० ॥
इसने मेरी प्रिया बांधी है इस कारण इससे द्वेष मत करो मैं अपने किये
पूर्व जन्मके कर्मानुसारही बन्धी हूं ॥ १७० ॥
दारिद्र्यरोगदुःखानि बन्धनव्यसनानि च ।
आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ॥ १७१ ॥
दरिद्र, रोग, दुःख, बन्धन, व्यसन यह आत्मापराधवृक्षके फल देह
धारियोंको होते हैं ॥ १७१ ॥
तस्मात्त्वं द्वेषमुत्सृज्य मद्बन्धनसमुद्भवम् ।
धर्मे मनः समाधाय पूज्यैनं यथाविधि ॥ १७२ ॥
इस कारण तू मेरे बंधनसे उत्पन्न हुए द्वेषको त्यागन कर धर्ममें मनको
लगाय यथाविधिसे इसको पूजनकर ॥ १७२ ॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा धर्मयुक्तिसमन्वितम् ।
उपगम्य ततोऽधृष्टः कपोतः प्राह लुब्धकम् ॥ १७३ ॥
उसके धर्म और युक्तिके वचन सुनकर लुब्धकके पास जाय नम्रतासे
कपोत बोला ॥ १७३ ॥
सुस्वागतं भद्र तेऽस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते ।
सन्तापश्च न कर्त्तव्यः स्वगृहे वर्त्तते भवान् ॥ १७४ ॥