पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३४० ) पञ्चतन्त्रम् ।
डप्रहारो विस्मर्त्तव्यः, ? त्वया पुत्रशोकदुःखं कथं विस्मर्त्त-
व्यम् ?” । इत्युक्त्वा बहुमूल्यं हीरकमणिं तस्मै दत्त्वा “अतः
परं पुनस्त्वया न आगन्तव्यम्” इति पुनरुक्त्वा विवरान्तर्गतः।
ब्राह्मणश्च मणिं गृहीत्वा पुत्रबुद्धिं निन्दन् स्वगृहमागतः ।
अतोऽहं ब्रवीमि-
यह कह फिरभी ब्राह्मण प्रातःकाल दुध ग्रहण कर वहां जाकर ऊंचे स्वरसे
सर्पकी स्तुति करने लगा । तब सर्प अधिक वल्मीकके भीतर लीन हुआही ब्राह्म-
णसे बोला-“तू लोभसे यहां आया है पुत्रशोक भी छोड दिया ! अब तेरी
और मेरी प्रीति उचित नही । यौवनके मदसे तेरे पुत्रने मुझे ताडन किया है।
मैने उसे काट लिया। किस प्रकार मै लगुडप्रहार भूल जाऊंगा ? और तू
पुत्रशोकका दुःख किस प्रकार भूल सकता है ?” । ऐसा कह एक बहुत
मोलका हीरा उसे देकर “बस अब तू यहां न आना” यह फिर कह विवरके
भीतर गया । ब्राह्मणभी मणिको ले पुत्रकी बुद्धिकी निन्दा करता अपने घर
आया । इससे मैं कहता हूं-
“चितिकां दीपितां पश्य फटां भग्नां ममैव च ।
भिन्नश्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्द्धते ॥ १३८ ॥”
“प्रज्वलित चिता और फटा हुआ मेरा फन देखकर जानले कि भिन्न
होकर जुडी प्रीति स्नेहसे नहीं बढती ॥ १३८ ॥”
तदस्मिन् हते यत्नादेव राज्यमकण्टकं भवतो भवति” ।
तस्य एतद्वचनं श्रुत्वा क्रूराक्षं पप्रच्छ,-“भद्र ! त्वं तु किं
मन्यसे ?” सोऽब्रवीत,-“देव ! निर्दयमेतत्, यदनेन अभि-
हितम् । यत् कारणं शरणागतो न वध्यते । सुष्ठु खलु
इदमाख्यातम्-
सो इसके मारनेसे यत्नपूर्वक तुम्हारा अकंटक राज्यहो” उसके यह बचन
सुन क्रूराक्षसे पूछा-“भद्र ! तुम इसमें क्या मानते ? ” । वह बोला-“देव यह
निर्दयता हे जो इस मन्त्रीने कहा है । कारण कि शरणमें आया हुआ नहीं
मारा जाता । यह सत्य कहा गया है कि-