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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३३३ )

जनान् प्रोवाच-“अहो ! ज्ञायतां तेषां मार्गः । कतमेन मार्गेण
प्रनष्टाः काकाः । तत् यावत् न दुर्गं समाश्रयन्ति, तावत् एव
पृष्ठतो गत्वा व्यापदयामि । उक्तञ्च-
ऐसा कह चारों ओरसे न्यग्रोध वृक्षके नीचे घेरकर स्थितहुआ। जब कि,कोई
कौआ न देखा तब शाखाके आगे आरूढ होकर प्रसन्न मन बन्दी जनोंसे स्तुतिं
को प्राप्त होकर शत्रुमर्दन वह उन परिजनोको बोला,-“अहो ! उनका मार्ग
जाना जावे किस मार्गसे वे काक भागे हैं । सो जबतक वे किसी दुर्गका आश्रय
नकरें तबतक उनके पीछे जाकर उन्हे नष्ट करू, कहाहै-
वृतिमप्याश्रितःशत्रुरवध्यः स्याज्जिगीषुणा ।
किं पुनः संश्रितो दुर्गे सामग्र्या परया युतम् ॥ १२९ ॥ ”
आवरणमे स्थित हुआ शत्रु जीतनेकी इच्छा करनेवालेको अवध्य होता है
फिर सम्पूर्ण सामग्रीसे युक्त दुर्गमे स्थित हुआ तो ( अवध्य हेही ) ॥ १२९ ॥”
अथ एतस्मिन् प्रस्तावे,स्थिरजीवी चिन्तयामास “यत
एते अस्मत् शत्रवोऽनुपलब्धास्मद्वृत्तान्ता यथागतमेव यान्ति
ततो मया न किंचित् कृतं भवति । उक्तंच-
तब इस प्रस्तावके होनेमें स्थिरजीवी विचारने लगा “जो यह हमारे शत्रु हमारे
वृत्तान्तको न जाननेवाले यथेच्छ गमनकरेंगे तो मेरा कुछ भी कृत्य न
हुआ । कहाहै-
अनारम्भो हि कार्याणां प्रथमं बुद्धिलक्षणम् ।
प्रारब्धस्यान्तगमनं द्वितीयं बुद्धिलक्षणम् ॥ १३० ॥
कार्यका आरम्भ न करनाही प्रथम बुद्धिकी चिन्हहै ओर आरम्भ कर उसके
अन्तमें गमनकरना यह दूसरा बुद्धिका चिन्हहै ( बुद्धिमान् प्रथम तौ कार्य आरम्भ
नहीं करते ओर आरम्भकर पूरा करते हैं यह भावहै ) ॥ १३० ॥-
तद्वरमनारम्भो न च आरम्भविघातः । तदहमेतान् शब्दं
संश्राव्य आत्मानं दर्शयामि" इति । विचार्य मन्दं मन्दं शब्द-
मकरोत् । तत् श्रुत्वा ते सकला अपि उलूकाः तद्वधाय प्रजग्मुः
अथ तेनोक्तम्-“अहो ! अहं स्थिरजीवी नाम मेघवर्णस्य
मन्त्री । मेघवर्णेन एव ईदृशीमवस्थां नीतः । तन्निवेदयत