पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। ( ३२१ )
सम्पद्यते" । ततो दूरस्थितावूचतुः-“भो भोः तपस्विन्
धर्मोपदेशक ! आवयोर्विवादो वर्तते । तद्धर्मशास्त्रद्वारेण
अस्माकं निर्णयं कुरु यो हीनवादी स ते भक्ष्य इति” । स
आह,-“भद्रौ ! मा मैवं वदतम् । निवृत्तोऽहं नरकपातक-
मार्गादहिंसैव धर्ममार्गः । उक्तञ्च-
इस प्रकार उसके धर्मोपदेशको सुनकर खरगोश बोला,-“भो कपिंजल !
यह नदीके किनारे धर्मवक्ता तपस्वी स्थित है। सो इससे पूछे” । कपिंजल
बोला,-“यह तो स्वभावसे हमारा शत्रुभूत है। सो दूरसे स्थित होकर पूछे ।
कदाचित् इसका व्रतभंग होजाय” । यह दोनों दूर स्थित होकर बोले,-“भो
भो तपस्वी धर्मोपदेशक ! हम दोनोंका विवाद हो रहा है। सो धर्मशास्त्रके द्वारा
हमारा निर्णय करो जो हारे वह तेरा भक्ष्य होगा” । वह बोला,-“भद्रो ! ऐसा
मत कहो । अब मै नरकपातके मार्गसे निवृत्त हू अहिंसाही परम धर्म
है । कहा है-
अहिंसापूर्वको धर्मो यस्मात्सद्भिरुदाहृतः ।
यूकमत्कुणदंशादींस्तस्मात्तानपि रक्षयेत् ॥ १०५ ॥
जिस कारण कि, महात्मा पुरुषोंने अहिंसा प्रधान धर्म कहा है इस कारण
जू, खटमल, डांसादिकीभी रक्षा करे ॥ १०५ ॥
हिंसकान्यपि भूतानि यो हिनस्ति स निर्घृणः ।
स याति नरकं घोरं किं पुनर्यः शुभानि च ॥ १०६ ॥
जो हिंसक प्राणियोंको मारता है वहभी निर्दयी है वहभी घोर नरकको
जाता है और जो अच्छे ( अहिंसक ) जीवोंको मारता है उसकी तो क्या
कहें ॥ १०६ ॥
एतेऽपि ये याज्ञिका यज्ञकर्मणि पशून् व्यापारयन्ति ते
मूर्खाः परमार्थं श्रुतेर्न जानन्ति । तत्र किल एतदुक्तमजै-
र्यष्टव्यम् । अजा व्रीहयः तावत् सप्तवार्षिकाः कथ्यन्ते न पुनः
पशुविशेषाः । उक्तञ्च-
और जो यह यज्ञ करनेवाले यज्ञमे पशुओंको मारते हैं वे मूर्ख हैं यथार्थसे
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