पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (३०३)
पंडित जन नाश करने योग्य शत्रुकोभी बढाते हैं कारण कि, गुडसे वृद्धिको
प्राप्त हुआ कफ सुखसे निपातन किया जाताहै (इसी प्रकार प्रथम विश्वासको
उत्पन्न कर शत्रुको बढावे पीछे मार डाले ) ॥ ६१ ॥
तथाच-
तैसेही-
स्त्रीणां शत्रोः कुमित्रस्य पण्यस्त्रीणां विशेषतः ।
यो भवेदेकभावेन न स जीवति मानवः ॥ ६२ ॥
स्त्रीका, शत्रु का, कुमित्रका विशेषकर वेश्याओका जो मित्र होता है वह मनुष्य
जीता नही है ॥ ६२ ॥
कृत्यं देवद्विजातीनामात्मनश्च गुरोस्तथा ।
एकभावेन कर्त्तव्यं शेषं द्वैधं समाश्रितम् ॥ ६३ ॥
देवता द्विज अपना और गुरु इनसे निरन्तर एकभावसे रहना चाहिये और
इतर कृत्य द्वैधीभावसे करना चाहिये ॥ ६३ ॥
एको भावः सदा शस्तो यतीनां भावितात्मनाम् ।
स्त्रीलुब्धानां न लोकानां विशेषेण महीभृताम् ॥ ६४ ॥
ज्ञानीयतियोंको सदा एकभावसे रहना चाहिये और विशेषकर स्त्री लुब्धक
तथा राजाओंको एकभाव नहीं करना चाहिये ॥ ६४ ॥
तद्वैधीभावं संश्रितस्य तव स्वस्थाने वासो भविष्यति
लोभाश्रयाच्च शत्रुमुच्चाटयिष्यसि । अपरं यदि किञ्चित्
छिद्रं तस्य पश्यसि तद्गत्वा व्यापादयिष्यसि” मेघवर्ण
आह-“तात ! मया सोऽविदितसंश्रयः, तत् कथं तस्य
छिद्रं ज्ञास्यामि” । स्थिरजीवी आह-“वत्स न केवलं
स्थानं छिद्राण्यपि तस्य प्रकटीकरिष्यामि प्रणि-
धिभिः । उक्तञ्च-
सो द्वैधीभावको प्राप्त होकर तुम्हारा इसी स्थानमे निवास होगा लोभके
आश्रयसे शत्रुको उच्चाटन करसकोगे । और यदि किसी प्रकार उसका छिद्र
देखो तो जाकर मार डालना”। मेघवर्ण बोला- 'तात मुझे उसके आश्रयकी